नई दिल्ली: इस वर्ष पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे ने भारत की आर्थिक नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया है। महिंद्रा समूह के चेयरमैन आनंद महिंद्रा के अनुसार, यह सर्वे पहली बार भारतीय शहरों को विकास के केंद्र में रखता है, न कि उन्हें केवल प्रशासनिक या प्रबंधन की समस्या के रूप में देखता है।
सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया में महिंद्रा ने कहा कि यह इकोनॉमिक सर्वे भविष्य के लिए एक साहसिक और आशावादी दृष्टि को अर्थव्यवस्था की वास्तविक कमजोरियों के आकलन के साथ जोड़ता है। हालांकि, उनके लिए सबसे उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि सर्वे में शहरों पर गंभीरता से ध्यान दिया गया है, जो अब तक आर्थिक नीति चर्चाओं में अपेक्षाकृत उपेक्षित विषय रहा है।
इकोनॉमिक सर्वे में यह सुझाव दिया गया है कि 10 लाख से अधिक आबादी वाले प्रत्येक भारतीय शहर को 20 वर्षों की सिटी स्पेशियल और इकोनॉमिक प्लान तैयार करनी चाहिए, जिसे हर पांच साल में अपडेट किया जाए। सर्वे के अनुसार, भारत के शहरों को राष्ट्रीय समृद्धि में उनकी भूमिका के अनुरूप संस्थागत, वित्तीय और नियोजन संबंधी आधार अब तक नहीं दिए गए हैं।
सर्वे यह भी रेखांकित करता है कि शहरीकरण ने उत्पादकता, नवाचार और श्रम बाजारों को शहरों में केंद्रित किया है, लेकिन इसके साथ ही भीड़भाड़, अनौपचारिकता और शासन की जटिलताएं भी बढ़ी हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सर्वे एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर देता है।
दस्तावेज में कहा गया है कि आपूर्ति पक्ष पर शहरी भूमि को खोलने, स्पष्ट भूमि स्वामित्व, बेहतर घनत्व मानदंड और ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट के जरिए किफायती आवास का विस्तार किया जा सकता है और शहरों के अनियंत्रित फैलाव को रोका जा सकता है। वहीं, परिवहन के मोर्चे पर वाहनों की बजाय लोगों को प्राथमिकता देने, सार्वजनिक परिवहन सुधारने और डिमांड मैनेजमेंट अपनाने से उत्पादकता बढ़ाने के साथ जीवन गुणवत्ता में सुधार संभव है।
आनंद महिंद्रा ने कहा कि संभवतः पहली बार शहरों को केवल आवास की कमी, ट्रैफिक या वेलफेयर डिलीवरी के नजरिए से नहीं, बल्कि कोर इकोनॉमिक सिस्टम के रूप में पहचाना गया है। उनके अनुसार, यह पहले की नीति सोच से स्पष्ट अलगाव है, जहां शहरी क्षेत्रों को रणनीतिक संपत्ति के बजाय समस्या के रूप में देखा जाता था।
महिंद्रा ने यह भी रेखांकित किया कि सर्वे सफल शहरीकरण को केवल उत्पादन या आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं रखता। यदि यह सोच आने वाले बजट और संस्थागत सुधारों में सही तरीके से उतारी जाती है, तो यह शहरों को समस्याओं के प्रबंधन से निकालकर भारत की आर्थिक वृद्धि के प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित करने की दिशा में एक लंबे समय से प्रतीक्षित बदलाव साबित हो सकता है। उनके अनुसार, जो शहर जीवन गुणवत्ता को प्राथमिकता देते हैं, वे प्रतिभा को आकर्षित और बनाए रखने में अधिक सक्षम होते हैं, जिससे रचनात्मकता और दीर्घकालिक विकास को बल मिलता है।