नई दिल्ली: 2025-2026 के वित्त वर्ष के इकोनॉमिक सर्वे में पहली बार भारत में मोटापे और अस्वस्थ खानपान को सीधे आर्थिक जोखिमों की सूची में शामिल किया गया है। गुरुवार को संसद में पेश इस सर्वे में सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है।
सर्वे में कहा गया है कि आज भारत क्या खा रहा है, इसका असर आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, जिससे मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप उत्पादकता घटेगी और स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च बढ़ेगा। लंबी अवधि में यह सरकार पर वित्तीय दबाव भी बढ़ा सकता है।
इसी स्थिति को देखते हुए सर्वे ने सिफारिश की है कि सभी मीडिया प्लेटफॉर्म पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के मार्केटिंग और विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने पर गंभीरता से विचार किया जाए। मोटापा और नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज से निपटने के लिए इसे सबसे कड़े नीतिगत प्रस्तावों में से एक बताया गया है।
सर्वे में यह भी कहा गया है कि भारत अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बिक्री के मामले में दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक बन गया है। 2009 से 2023 के बीच इसकी बिक्री में 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। 2006 में भारत में इसकी रिटेल बिक्री मात्र 90 करोड़ डॉलर थी, जो 2019 में बढ़कर लगभग 3800 करोड़ डॉलर तक पहुंच गई। इसका मतलब लगभग 40 गुना वृद्धि हुई है।
UPF के उपयोग में इस तेज वृद्धि के साथ-साथ देश में मोटापे की दर भी लगभग दोगुनी हो गई है। पुरुष और महिलाओं दोनों में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है। सर्वे में उल्लेख किया गया है कि दुनिया भर में खानपान की आदतों में बदलाव के साथ ऐसे स्वास्थ्य जोखिमों का संबंध पाया जा रहा है।
सर्वे में उद्धृत नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, देश की 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति बच्चों की है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में ओवरवेट की दर 2015–16 में 2.1 प्रतिशत थी, जो 2019–21 में बढ़कर 3.4 प्रतिशत हो गई।
संख्याओं के अनुसार 2020 में भारत में लगभग 3 करोड़ 30 लाख बच्चे मोटापे से ग्रस्त थे। सर्वे के अनुमान के अनुसार यह संख्या 2035 तक बढ़कर लगभग 8 करोड़ 30 लाख तक पहुंच सकती है। इसका मुख्य कारण अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का तेजी से प्रसार है।
अंतरराष्ट्रीय शोधों के हवाले से सर्वे में बताया गया है कि अधिक मात्रा में UPF का सेवन कई दीर्घकालिक बीमारियों से सीधे जुड़ा हुआ है, जिनमें मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग, श्वसन तंत्र से जुड़ी समस्याएं और मानसिक स्वास्थ्य विकार शामिल हैं। सर्वे का स्पष्ट संदेश है कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो इसका आर्थिक और सामाजिक मूल्य भविष्य में देश को चुकाना पड़ेगा।