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क्या एआई ले सकता है इंसानों की नौकरी? बढ़ता खतरा या नया अवसर?

फिल्म की पटकथा और रोजमर्रा की जिंदगी की कठोर हकीकत बिल्कुल अलग दुनिया की चीजें हैं।

By सुदीप्त तरफदार, Posted by : राखी मल्लिक

Feb 18, 2026 12:42 IST

नई दिल्ली : कोलॉसस: द फॉर्बिन प्रोजेक्ट, 54 साल पहले रिलीज हुई इस फिल्म ने पहली बार दिखाया था कि मशीनी दिमाग किस प्रकार मानव सभ्यता पर किस प्रकार हानी होने की कोशिश कर सकता है। उसके बैद द टर्मिनेटर, आई, रोबोट, ऐवेंजर: एज ऑफ अल्ट्रन, एम3जीएएन और मिशन: इम्पोसिबल- डेड रेकोनिंग पार्ट वन जैसी कई फिल्मों में इंसान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लड़कर आखिर में जीत हासिल की है।

लेकिन फिल्मों की कहानी और असली जिंदगी की हकीकत बिल्कुल अलग होती है। जो काम चैटजीपीटी, जेमिनी, एजेंटिक एआई या क्लॉड पलक झपकते कर सकते हैं, उतनी तेजी और सटीकता से इंसान के लिए करना मुश्किल है। इसलिए फिर वही सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में एआई इंसानों की जगह ले लेगा? क्या कंपनियां ज्यादा सटीकता और उत्पादकता के लिए कर्मचारियों को निकालकर उनकी जगह एआई टूल्स का इस्तेमाल करेंगी?

हाल ही में Anthropic के क्लॉड कोवर्क जैसे एजेंटिक कोडिंग एआई प्लग-इन आने के बाद यह बहस और तेज हो गई है। इनकी जबरदस्त कार्यक्षमता के कारण दुनिया भर (भारत सहित) की टेक और आईटी कंपनियों के बाजार मूल्य में भारी गिरावट आई है।

कई बड़ी संस्थाएं यह मानती हैं कि खतरा सच में बढ़ रहा है। Goldman Sachs का कहना है कि एआई 30 करोड़ फुल-टाइम नौकरियां खत्म कर सकता है। फोर्ब्स ने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और बॉस्टन यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के आधार पर कहा है कि इसी साल 20 लाख नौकरियां एआई की वजह से जा सकती हैं।

मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक संभावना है कि दुनिया के 14% कर्मचारियों को डिजिटलीकरण, रोबोटिक्स और खासकर एजेंटिक व जेनरेटिव एआई के कारण नई नौकरी या नया करियर ढूंढना पड़ सकता है। World Economic Forum और Price water house Coopers के विशेषज्ञों का कहना है कि 2026 तक 8.5 करोड़ नौकरियां प्रभावित होंगी और 2030 तक दुनिया के 30% कर्मचारियों की स्थिति बदल सकती है।

सबसे ज्यादा खतरा कस्टमर सर्विस, अकाउंट्स, रिसर्च एनालिसिस, वेयरहाउस, अंडरराइटिंग और रिटेल जैसे क्षेत्रों में बताया जा रहा है।

दूसरी ओर कुछ लोग कहते हैं कि क्या एआई शिक्षक, वकील, जज, कंपनी के डायरेक्टर या सीईओ, एचआर मैनेजर, मनोवैज्ञानिक या सर्जन बन सकता है? इन कामों में तुरंत निर्णय लेना और जरूरत पड़ने पर उसे बदलना होता है। क्या एआई लेखक या कलाकार बन सकता है? मशीन वही करती है जो उसके एल्गोरिद्म में डाला गया है। उसमें खुद से सोचने या रचनात्मक आनंद लेने की क्षमता नहीं होती। एआई रचनात्मक भावनाएं प्रकट नहीं कर सकता।

हां, डेटा एंट्री जैसे दोहराए जाने वाले कामों में एआई मददगार हो सकता है, लेकिन बड़े और गुणात्मक फैसलों में इंसान का विकल्प बनना मुश्किल है। वहीं कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि जेनरेटिव एआई कुछ नौकरियां खत्म जरूर करेगा, लेकिन नए तरह के रोजगार भी पैदा करेगा।

कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक असली खतरा कहीं और है। कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारी अनजाने में खुद ही अपनी नौकरी के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।

कंपनियां जो एआई इस्तेमाल कर रही हैं, वह खास तौर पर उनके काम के हिसाब से बनाया गया एंटरप्राइज एआई सिस्टम होता है। कर्मचारी रोज उस सिस्टम पर काम करते हुए उसकी कमियां दूर करते रहते हैं। इस तरह एआई कर्मचारियों के काम से लगातार सीखता जाता है और भविष्य में इंसानों की जरूरत कम कर सकता है।

इस अदृश्य खींचतान में आखिर जीत किसकी होगी, इंसान की या एआई की यह तो अब समय ही बताएगा।

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