नई दिल्ली : भारत-अमेरिका द्विपक्षीय समझौते की शर्तों को लेकर दुनिया के विमान और अंतरिक्ष उद्योग के शीर्ष निर्माता रुचि दिखाने लगे हैं। उन्होंने पहले ही दोनों देशों के व्यापार समझौते की शर्तों की बारीकियों की जांच शुरू कर दी है। दुनिया के तेजी से बढ़ते उड़ान बाजार में अपनी उपस्थिति और मजबूत करने के उद्देश्य से यह रुचि दिखाई दे रही है, ऐसा संबंधित सूत्रों ने समाचार एजेंसियों को बताया। इस नए समझौते से भारत के विमान और अंतरिक्ष उद्योग में निर्यात, निवेश और उत्पादन क्षमता में जो बड़े बदलाव आने वाले हैं, उस पर पहले ही अटकलें तेज हो गई हैं।
समझौते का एक प्रमुख पहलू यह है कि भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले विमान निर्माण के पुर्जों पर पूरी तरह से शुल्क हटाया जाएगा। इसके कारण भारत यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे स्थापित अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन के साथ बराबरी की स्थिति में आ गया है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार ऑपरेशनल दृष्टि से कुछ स्पष्टता अभी बाकी है, लेकिन अगले कुछ दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा। यदि यह निर्णय लागू होता है, तो भारत के एयरोस्पेस निर्यात में भारी वृद्धि होने की संभावना है।
उल्लेखनीय है कि वर्तमान में भारत से वर्ष में 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के विमान पुर्जे एयरबस खरीदा जाता है। वहीं एक और विमान निर्माता बोइंग के मामले में यह राशि लगभग 1.25 बिलियन अमेरिकी डॉलर है।
इस संदर्भ में बोइंग ने पहले ही संकेत दिया है कि वह भारत से पुर्जे की खरीद को दोगुना कर सकता है। केंद्र के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, अगले कुछ वर्षों में भारत बोइंग का एक प्रमुख विदेशी घटक आपूर्तिकर्ता बन सकता है। साथ ही समझौते के तहत एयरोस्पेस उत्पादों पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है, जिससे देश की आंतरिक सप्लाई चेन को बड़ी राहत मिलने की संभावना है, ऐसा विशेषज्ञ मानते हैं।
इस शुल्क कटौती का प्रभाव भारत की उड़ान कंपनियों के ऑर्डर योजना पर भी पड़ सकता है। वर्तमान में एयर इंडिया ग्रुप और स्काई एयर जैसी कंपनियों से बोइंग के पास लगभग 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर के विमान ऑर्डर लंबित हैं। उद्योग सूत्रों का दावा है कि इंडिगो बहुत जल्द वाइड-बॉडी विमानों का एक बड़ा ऑर्डर दे सकता है, जिस पर बोइंग कड़ी नजर रखे हुए है।
भारत में बोइंग के प्रेसिडेंट सलील गुप्ते ने बताया कि यह व्यापार समझौता बहुमुखी अवसरों के दरवाजे खोलता है और द्विपक्षीय व्यापार एवं आर्थिक संबंधों को नई गति दे सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार एयर इंडिया और इंडिगो के नेतृत्व में भारतीय एयरलाइंस आने वाले समय में विमान, इंजन और स्पेयर पार्ट्स मिलाकर 70 से 80 बिलियन अमेरिकी डॉलर के ऑर्डर दे सकती हैं।
हालांकि भारत की सभी एयरलाइंस निजी स्वामित्व वाली हैं और ऑफसेट बाध्यताओं के अंतर्गत नहीं आतीं, फिर भी ‘मेक इन इंडिया’ नीति के प्रभाव से विमान निर्माता धीरे-धीरे भारत से पुर्जों की खरीद बढ़ा रहे हैं, ऐसा अधिकारियों ने बताया। नए ऑर्डर लागू होने पर बोइंग कम से कम दोगुनी गति से भारतीय सप्लायर्स से खरीद बढ़ाने की उम्मीद कर रहा है। कुल मिलाकर, भारत-अमेरिका व्यापार समझौता भारत के एयरोस्पेस उद्योग को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर और मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बन सकता है।