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भारत–अमेरिका व्यापार समझौते पर विपक्ष की आपत्तियां, राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हुई तेज

भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के प्रारंभिक मसौदे से वाम दल और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने व्यापार समझौते की विभिन्न शर्तों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

By देवार्घ्य भट्टाचार्य, Posted by : राखी मल्लिक

Feb 09, 2026 17:19 IST

नई दिल्ली : करीब नौ महीने के लंबे अंतराल के बाद इस फरवरी में भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बातचीत में तेजी आई है। पिछले शनिवार वॉशिंगटन ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते का प्रारंभिक मसौदा जारी किया। इसके बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत के रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया। 2 अप्रैल 2025 को ट्रंप द्वारा लगाए गए भारी शुल्क के 18 प्रतिशत पर आ जाने से भारत के निर्यात को गति मिलने की संभावना है, ऐसा विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है।

हालांकि भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के इस प्रारंभिक मसौदे से वाम दल और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने समझौते की कई शर्तों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

शनिवार को कांग्रेस की ओर से आरोप लगाया गया कि इस व्यापार समझौते से भारत को कोई लाभ नहीं हुआ है। उनका दावा है कि यह कोई समझौता नहीं, बल्कि ट्रंप प्रशासन के सामने आत्मसमर्पण है। कांग्रेस की ओर से पवन खेड़ा ने कहा कि आने वाले समय में भारत अमेरिकी उत्पादों के लिए एक डंपिंग ग्राउंड बन सकता है, जिससे देश के किसानों और सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों के हितों को नुकसान पहुंचेगा।

इसके अलावा भारत द्वारा तेल खरीद पर ट्रंप प्रशासन द्वारा “मॉनिटरिंग” शब्द के इस्तेमाल को लेकर भी उन्होंने केंद्र की आलोचना की। उल्लेखनीय है कि व्यापार समझौते के मसौदे में ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि भारत प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रूसी तेल का आयात दोबारा शुरू करता है या नहीं, इस पर नजर रखने के लिए एक व्यवस्था लागू की गई है।

इधर कांग्रेस के साथ सुर मिलाते हुए वाम दलों ने भी मोदी सरकार पर व्यापार समझौते को लेकर हमला बोला है। रविवार को सीपीएम ने दावा किया कि अंतरिम व्यापार समझौते में केंद्र सरकार ने अमेरिका को 'व्यापक रियायतें' दी हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि और संप्रभुता के लिए चिंता का विषय है।

एक बयान में उन्होंने कहा कि भारत–अमेरिका व्यापार समझौते की जानकारी धीरे-धीरे सामने आ रही है, लेकिन यह साफ हो गया है कि केंद्र सरकार ने इस इंटरिम डील में अमेरिका को बड़े पैमाने पर छूट दी है। उनका कहना है कि इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाने चाहिए और इसकी पूरी जानकारी संसद में पेश की जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने इस द्विपक्षीय व्यापार समझौते को किसानों, मजदूरों और आम जनता के बड़े हिस्से के हितों के खिलाफ भी बताया।

हालांकि वाम और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों के इन आरोपों को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि भारत–अमेरिका व्यापार समझौते का प्रारंभिक मसौदा रचनात्मक चर्चा के जरिए तैयार किया गया है और इसमें कृषि क्षेत्र की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित की गई है, क्योंकि सरकार के लिए देश के किसान बेहद महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी उत्पाद इस समझौते में शामिल नहीं किया गया है, जिससे भारतीय किसानों को जरा सा भी नुकसान हो।

भारत–अमेरिका व्यापार समझौता दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत की नीति समझौता करने की नहीं, बल्कि अपने वादों पर कायम रहने की है। हम भारत के हित में ही फैसले ले रहे हैं।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने यह भी कहा कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस दौरान सरकार ने सौदेबाजी नहीं की, बल्कि रचनात्मक बातचीत के जरिए समझौते तक पहुंची है। जिन उत्पादों में किसानों की ताकत है, उन्हें इस समझौते से बाहर रखा गया है। साथ ही जेनेटिक तरीके से संशोधित (जेएम) उत्पादों को भारत के बाजार में न लाने का फैसला किया गया है, जिससे देश के कृषि उत्पादों की शुद्धता बनी रहेगी। उनके शब्दों में, “हमारी मिट्टी और हमारे बीज सुरक्षित रहेंगे।”

रविवार को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान में भी शिवराज सिंह चौहान जैसी ही बात सुनाई दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस व्यापार समझौते में देश की कृषि और उद्योग के हितों की पूरी तरह सुरक्षा की गई है। उनका कहना है कि यह व्यापार समझौता आने वाले समय में भारत के किसानों की प्रगति में सहायक साबित होगा।

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