आनंदपुर में जिन लोगों की भयावह आग में झुलसने से दुःखद मौत हुई है उनके परिचय के नाम पर बचा हुआ है बोनमैरो, टूथ पल्प यानी दांत के अंदर का मांसल हिस्सा। नरेंद्रपुर थानांतर्गत आनंदपुर के नजीराबाद में गोदाम से जो जले हुए शव बरामद हुए हैं उनकी पहचान करने का मात्र यहीं दोनों हिस्सा बचा हुआ है।
बताया जाता है ताप नियंत्रक कवच होने की वजह से शरीर के इन दोनों हिस्सों का DNA सही सलामत अवस्था में मिलने की संभावना है। इसलिए उन सभी 21 शवों या देहांशों से इन दोनों हिस्सों से ही DNA का नमूना संग्रह करने पर जोर दिया जा रहा है।
लिया गया परिजनों के DNA का नमूना
कांटापुकुर मॉर्ग में बुधवार और गुरुवार को प्रत्येक देहांश से 2 नमूना यानी कुल 42 नमूना एकत्र किया गया है। इन नमूनों के आधार पर DNA प्रोफाइल तैयार की जा रही है। इसमें दावेदार परिवार के निकटतम संबंधी और डायरेक्ट सदस्य के खून से DNA लेकर उसे भी शामिल किया जाएगा।
इसलिए बुधवार को ही बारुईपुर महकमा अदालत में निकटतम संबंधियों के खून का नमूना इकट्ठा किया जा चुका है। जानकारों का मानना है कि 28 लापता लोगों के DNA प्रोफाइल को मैच करवाने में सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैब (CFSL) को कम से कम 3 सप्ताह का समय लग सकता है। प्रत्येक देहांश के DNA से उन 28 लापता लोगों के परिजनों का DNA मिलाकर देखा जाएगा। यह काम जल्दबाजी का भी नहीं है और जल्दी करना भी संभव नहीं है।
क्या देहांशों से मिलेगा DNA?
मिली जानकारी के अनुसार 'लापता' लोगों द्वारा इस्तेमाल किए गए टूथ ब्रथ और 'एक्सक्लुसिव' तरीके से इस्तेमाल हुए कंघी पर अधिक भरोसा किया जा रहा है। इसमें फंसे एपिथेलियल कोस से DNA प्रोफाइल बनाया जाएगा। इसके बाद लापता व मृत व्यक्ति के DNA से उसे मिलाकर यह जानने की कोशिश की जाएगी कि दोनों का DNA क्या हूबहू मैच कर रहा है।
हालांकि फॉरेंसिक मेडिसिन के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. अजय गुप्त का कहना है कि इतनी तेज गर्मी की वजह से देहांशों से DNA प्रोफाइलिंग के लिए नमूना इकट्ठा करना बेहद मुश्किल भरा काम हो सकता है। देहांश टुकड़ों में मिले हैं, जिसमें कंकाल, हड्डियां, खोपड़ी और दांत के टुकड़े शामिल हैं। उसमें यदि मांस, शरीर का जलीय पदार्थ, सॉफ्ट या लिक्विड टिश्यू कुछ भी मिलेता है तो वहां से DNA आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन ऐसी कोई संभावना यहां है या नहीं यह संदेह की बात है।
क्यों दांतों और हड्डियों के अंदर मिल सकता है DNA?
कुछ ऐसी ही स्थिति 23 मार्च 2010 को स्टिफेन कोर्ट अग्निकांड के बाद हुई थी। वहां भी आग से झुलसकर इंसानी शरीर चारकोल बन चुके थे। उसी साल हुई ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे में कई DNA एक साथ मिलकर 'कॉन्टैमिनेशन' की खिचड़ी पक गयी थी। जिसमें से किसी एक व्यक्ति के DNA को ढूंढ निकालना बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम था।
हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि हड्डी और दांत के ऊपरी हिस्से में ताप निरोधक कवच रहता है। जिसे पेरियोस्टियम और एनामेल कहा जाता है। इसलिए बोनमैरो और टूथ पल्प के अंदर से प्राप्त टिश्यू ही DNA विश्लेषण के लिए आदर्श माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि एनामेल शरीर का सबसे कठोर टिश्यू होता है इसलिए 100 से 150 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी टूथ पल्प के अंदर मौजूद जैव-रसायन पूर्ण रूप से सुरक्षित रहते हैं।
पेरियोस्टियम की वजह से बोनमैरो भी सुरक्षित रहता है। बताया जाता है कि 200 डिग्री सेल्सियस तक बोनमैरो और टूथ पल्प में मौजूद जैव-रसायनों को कोई ऐसा नुकसान नहीं पहुंचता है, जिसकी वजह से DNA का विश्लेषण बाधित हो। जैव-रसायन कम से कम 300 डिग्री सेल्सियस की गर्मी पर ही नष्ट हो सकते हैं।
गोदाम में आग लगने के मामले में दावा किया जा रहा है कि तापमान 600 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है लेकिन दमकल अगर अपना काम जल्दी शुरू कर देती है तो वह तापमान ज्यादा देर तक स्थायी नहीं होता है। इसलिए देहांशों के इन दोनों अंश से ही DNA लेना ही बेहतर माना जा रहा है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
गौरतलब है कि ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे के बाद कई लाशों की पहचान के लिए 114 लाशों और शरीर के अंगों की DNA सैंपलिंग करने वाले फोरेंसिक मेडिसिन एक्सपर्ट सोमनाथ दास कहते हैं, "सबसे पहले, बोन मैरो और डेंटल पल्प सैंपल से तैयार DNA प्रोफाइल से 100% मैच करने की कोशिश की जाती है। इसके लिए मृतक या लापता व्यक्ति का सीधा सैंपल चाहिए होता है जो मृतक के इस्तेमाल किए गए टूथब्रश या कंघी से मिल सकता है। क्योंकि टूथब्रश सिर्फ आपका होता है और ब्रश करते समय रोजाना मसूड़ों के संपर्क में आने वाले दिखाई न देने वाले एपिथेलियल सेल्स ब्रश के ब्रिसल्स से चिपक जाते हैं। इसलिए वहां से DNA मैच करके इसे 100% मैच करना मुमकिन है।"
हालांकि सोमनाथ दास का यह भी कहना है कि अगर सीधा नमूना नहीं भी मिलता है तो भी इनडायरेक्ट सैंपल से पहचान की जा सकती है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले मृतक के शरीर या अंगों से DNA प्रोफाइल बनाई जाती है। उसके बाद दावेदार रिश्तेदारों से रक्त का नमून लेकर उससे DNA प्रोफाइलिंग की जाती है। इनडायरेक्ट नमूना के मामले में सिर्फ़ 'फर्स्ट डिग्री ब्लड रिलेशन' को ही माना जाता है। यानी पिता, माता, भाई, बहन, बेटा, बेटी। सबसे अच्छे माता-पिता होते हैं। क्योंकि हमारे शरीर के लगभग सभी सेल्स में जो 23 जोड़ी क्रोमोसोम होते हैं उनमें से कम से कम 95% से 97% क्रोमोसोम पिता या माता के क्रोमोसोम से मिलते-जुलते पाए जाते हैं।