कोलकाताः तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। त्रिपुरा के ख्वाई (खोवाई) की एक अदालत ने उन्हें समन जारी कर व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। यह मामला वर्ष 2021 में त्रिपुरा में हुए एक राजनीतिक विरोध प्रदर्शन से जुड़ा हुआ है। जानकारी के अनुसार, वर्ष 2021 में तृणमूल कांग्रेस के नेता देबांक्शु भट्टाचार्य, सुदीप राहा और जया दत्ता पार्टी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए त्रिपुरा गए थे। उस दौरान उन पर क्षेत्र में अशांति फैलाने का आरोप लगा और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इस गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक माहौल गर्मा गया था।
अपने नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर अभिषेक बनर्जी और अन्य तृणमूल नेताओं ने ख्वाई थाने के बाहर धरना दिया था। इस दौरान उनकी पुलिस अधिकारियों के साथ तीखी बहस भी हुई थी। इसी घटना के बाद ख्वाई थाने की पुलिस ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।
उसी मामले में अब त्रिपुरा की ख्वाई अदालत ने अभिषेक बनर्जी को समन भेजा है और उन्हें अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अदालत ने समन को पश्चिम बंगाल के अलीपुर कोर्ट के माध्यम से भेजा। निर्देश था कि संबंधित व्यक्ति को उसी दिन नोटिस सौंपा जाए।
समन पहुंचाने के लिए अदालत के एक विशेष कर्मचारी (बेलिफ) ने पहले कालीघाट थाने का रुख किया और फिर अभिषेक बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पहुंचे। हालांकि उस समय अभिषेक घर पर मौजूद नहीं थे, क्योंकि वे विपक्षी गठबंधन की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली गए हुए थे।
अभिषेक की अनुपस्थिति के कारण समन सौंपने को लेकर कुछ समय तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। बाद में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने उनकी ओर से समन स्वीकार कर लिया।
इसी बीच अभिषेक बनर्जी एक अन्य मामले को लेकर भी कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में कथित हस्ताक्षर जालसाजी मामले की जांच कर रही सीआईडी उन्हें पहले ही तीन बार नोटिस भेज चुकी है। हालांकि अब तक वे जांच एजेंसी के समक्ष पेश नहीं हुए हैं। इसके बजाय उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और कानूनी संरक्षण की भी मांग की है।
इस मामले में अदालत में जल्द सुनवाई होने वाली है। ऐसे समय में त्रिपुरा से आया नया समन अभिषेक बनर्जी की कानूनी और राजनीतिक चुनौतियों को और बढ़ा सकता है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि वह अदालत के निर्देश पर कब और किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं।