हावड़ा: हावड़ा और बंगाल के जूट उद्योग की बंदी ने हजारों मजदूरों की जिंदगी पर गहरा असर डाला है। अचानक मिल बंद होने से इनकी रोजी रोटी पर फिर से संकट मंडराने लगा है। साल की शुरुआत में हावड़ा के चेंगैल स्थित प्रेमचंद जूट मिल ने 20 जनवरी से 23 फरवरी तक अस्थायी रूप से अपने गेट बंद करने का ऐलान किया है। इस दौरान मिल के लगभग 4,000 मजदूर 'नो वर्क, नो वेज' पॉलिसी के तहत रहेंगे।
अधिकारी बताते हैं कि कच्चे जूट की बढ़ती कीमत, कच्चे माल की कमी, नकद में जूट खरीदने में कठिनाई और सीमित उत्पादन क्षमता ने उन्हें यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया। मिल अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान लूम की उत्पादन क्षमता कम होने के कारण लगातार घाटा हो रहा है। यदि 23 फरवरी तक हालात नहीं सुधरे, तो अगले कदम के बारे में नई अधिसूचना जारी की जाएगी।
ट्रेड यूनियन कोऑर्डिनेशन सेंटर (TUCC) के सेक्रेटरी हबीबुर रहमान ने कहा कि अधिकारी मजदूरों पर दबाव बनाने के लिए मिल बंद कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे श्रमिक परिवारों, स्थानीय व्यापार और इलाके की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।
जगदल जूट मिल का संकट
इससे पहले उत्तर 24 परगना जिले में स्थित जगदल जूट मिल को भी बंद कर दिया गया। यह मिल 5,000 श्रमिकों को रोजगार देती थी। वहां भी हफ्ते में प्रोडक्शन कम होने की शिकायत थी। मिल केवल दो शिफ्ट में चल रही थी। अचानक मजदूरों को गेट पर 'सस्पेंशन ऑफ वर्क' का नोटिस टंगा मिला। मजदूर हैरान हो गये और उनके परिवारों में रोजी-रोजगार को लेकर चिंता बढ़ गई है।
बंगाल में जूट उद्योग की स्थिति
पश्चिम बंगाल कभी भारतीय जूट उद्योग का मुख्य केंद्र था। राज्य में कुल 104 जूट मिलों में से 75 मिलें बंगाल में हैं और उद्योग का मूल्य लगभग ₹10,000 करोड़ है। इसके अलावा, तीन लाख से अधिक लोग इस उद्योग से असंगठित रूप से जुड़े हैं। मिलों में मालिकों की प्राथमिकता अब स्थायी श्रमिकों पर नहीं, बल्कि ‘जीरो नंबर’ श्रमिकों पर है। ये श्रमिक आधिकारिक रूप से पंजीकृत नहीं होते और अक्सर एजेंसियों के माध्यम से काम पर भेजे जाते हैं।
उत्तर 24 परगना जिले में अकेले लगभग 60,000 जूट मिल श्रमिक हैं जिनमें से अधिकांश अनुबंध पर काम करते हैं। दो-तिहाई श्रमिक केवल अनुबंध पर काम कर रहे हैं जिससे उन्हें स्थायी सुरक्षा और सामाजिक लाभ नहीं मिलता। इस कारण श्रमिक परिवार आर्थिक अस्थिरता का सामना कर रहे हैं। जूट उद्योग के ऐतिहासिक दौर में बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से हजारों मजदूर बंगाल आए थे। हाल के दशकों में कई मजदूर लौट चुके हैं या अन्य राज्यों में रोजगार की तलाश में चले गए हैं।
जूट उद्योग की चुनौतियां और भविष्य
स्थायी श्रमिकों की घटती संख्या और ‘जीरो नंबर’ श्रमिकों पर निर्भरता उद्योग की दीर्घकालीन स्थिरता के लिए खतरा हैं। उत्पादन घाटा, कच्चे जूट की कमी और अनुबंध श्रमिकों पर निर्भरता अगर समय रहते नहीं सुधारी गई, तो यह बंदी लंबे समय तक मजदूरों, व्यापारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए संकट बन सकती है। लंबे समय से इस उद्योग पर निर्भर परिवारों के लिए रोजी-रोटी का यह साधन अचानक ठप्प हो जाना न केवल आर्थिक संकट पैदा करता है, बल्कि उनके भविष्य और आशाओं पर भी सवाल खड़ा करता है। ‘नो वर्क, नो वेज’ की नीति के तहत घर लौटे मजदूर अब अनिश्चितता और असुरक्षा के साए में अपने परिवार का पेट पालने की जद्दोजहद कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संरचनात्मक सुधार और औद्योगिक नीति हस्तक्षेप के बिना बंगाल की जूट मिलों की पारंपरिक पहचान और श्रमिक वर्ग की सुरक्षा गंभीर जोखिम में पड़ सकती है।