नई दिल्लीः वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब लोकसभा में 2026-27 का केंद्रीय बजट पेश किया, तो वहां का माहौल राजनीति और अर्थव्यवस्था के बीच एक दिलचस्प संघर्ष का गवाह बना। जहां एक ओर वित्त मंत्री ने विकास और निवेश पर जोर दिया, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों ने इस बजट को चुनावी रणनीति करार दिया और उनके लिए यह एक राजनीतिक मंच बन गया।
सदन में गर्मजोशी और विरोध का मिश्रण
निर्मला सीतारमण का भाषण जैसे ही शुरू हुआ, भाजपा सांसदों ने जोरदार तालियां बजाकर उनका स्वागत किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी निर्मला की सराहना करते हुए उनके बजट भाषण को "ऐतिहासिक और भविष्यवादी" बताते रहे। दूसरी ओर, विपक्षी दलों के सदस्य, खासकर केरल और बंगाल से आए सांसदों ने इस बजट को अपने राज्यों की उपेक्षा और चुनावों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया बताया। उनके मुताबिक, बजट में चुनावी राज्यों के लिए कोई विशेष ऐलान नहीं किया गया था जो कि राजनीतिक माहौल को ध्यान में रखते हुए किया गया था।
यहां तक कि केरल के कांग्रेस सांसद भी वित्त मंत्री पर आरोप लगाते हुए खड़े हो गए और कहा कि बजट में उनके राज्य की अनदेखी की गई है। इन सब आरोपों के बीच, निर्मला सीतारमण ने बड़े धैर्य और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ अपना भाषण जारी रखा। उन्होंने कहा, "हमारे प्रधानमंत्री मोदी की सरकार कर्म पर विश्वास रखती है और हमारे द्वारा किए गए सुधार दूरदर्शिता और सच्चाई पर आधारित हैं।"
विकास की दिशा या चुनावी छल?
इस बजट के दौरान निर्मला सीतारमण ने जिस तरह निवेश और विकास की दिशा को उजागर किया, वह एक ठोस आर्थिक दृष्टिकोण था। बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर, स्मार्ट सिटी और प्रौद्योगिकी में निवेश को बढ़ावा देने की बातें की गईं। यह भाषण पूरी तरह से विकास के एजेंडे पर केंद्रित था और इसमें चुनावों के संदर्भ में किसी प्रकार की लोकलुभावन घोषणाओं से परहेज किया गया था।
वहीं, विपक्ष ने इसे राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित बताया और आरोप लगाया कि यह बजट खासकर चुनावों के पहले तैयार किया गया था। केरल, बंगाल और अन्य राज्यों के लिए कुछ विशेष घोषणाएं न किए जाने को लेकर विपक्षी दलों ने विरोध प्रदर्शन किया।
भाजपा का उत्साह, विपक्ष का असंतोष
इस दौरान भाजपा के सांसदों ने वित्त मंत्री के भाषण पर जोरदार ताली बजाई, लेकिन विपक्ष की प्रतिक्रिया इससे बिल्कुल विपरीत थी। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने वित्त मंत्री की ओर से किए गए दावे को सिरे से नकारते हुए कहा कि बजट में आवश्यक बदलावों की गंभीरता से अनदेखी की गई है। उनका कहना था कि सरकार ने बजट के माध्यम से केवल अपने राजनीतिक फायदे के लिए कदम उठाए हैं, जो कि आगामी चुनावों के दृष्टिकोण से एक राजनीतिक रणनीति हो सकता है।
सदन में गहमागहमी के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निर्मला सीतारमण के भाषण के बाद उनकी सराहना की और कहा कि यह बजट नवीनतम विकास मॉडल की ओर कदम बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम है। लेकिन विपक्षी दलों ने इसे एक हवाहवाई भाषण करार दिया और यह आरोप लगाया कि बजट में विकास के नाम पर केवल दिखावा किया गया है।
सदन में विवाद और विरोध के बीच बजट की प्रस्तुति
वित्त मंत्री का बजट भाषण ऐतिहासिक था, लेकिन इसके बाद जो विरोध प्रदर्शन हुआ, वह इस बजट के राजनीतिक असर को ही दर्शाता है। जहां निर्मला सीतारमण ने पूरे बजट को विकास और निवेश के एजेंडे पर प्रस्तुत किया, वहीं विपक्ष ने इसे लोकलुभावन रणनीति और राजनीतिक दृष्टिकोण से जोड़ा।
सदन में हुए इस विरोध प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया कि बजट का संदेश केवल आर्थिक दृष्टिकोण तक ही सीमित नहीं था, बल्कि राजनीतिक माहौल और चुनावों की रणनीति का भी इससे गहरा संबंध था।
क्या बजट केवल विकास की दिशा पर केंद्रित था?
निर्मला सीतारमण का बजट भाषण विकास और निवेश पर एक ठोस आर्थिक दृष्टिकोण पेश करता था, लेकिन विरोधी दलों के आरोपों ने यह सवाल उठाया कि क्या यह बजट राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित था। बजट के बाद सदन में गूंजते विरोधी नारे और सांसदों की तीखी प्रतिक्रियाएं यह दर्शाती हैं कि इस बजट ने सिर्फ आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक मोर्चे पर भी नए सवाल उठाए हैं।