नयी दिल्लीः मध्यम वर्ग को विशेष राहत न देने के बावजूद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने महिलाओं को ‘उद्यमी’ बनने का सपना दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उस सपने को साकार करने के लिए इस साल के बजट में उनका हथियार है ‘सेल्फ-हेल्प एंटरप्रेन्योर्स’ (SHE) मार्ट।
रविवार को बजट भाषण में निर्मला ने कहा, “लखपति दीदी कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए हम महिलाओं को एक और कदम आगे ले जाना चाहते हैं ताकि वे कर्ज-आधारित आजीविका की सीमाओं से बाहर निकलकर खुद उद्यमी बन सकें। इसी उद्देश्य से कम्युनिटी आधारित रिटेल आउटलेट यानी SHE मार्ट बनाए जा रहे हैं।”
क्या है SHE मार्ट?
यह ग्रामीण महिलाओं द्वारा बनाए गए उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने की एक पहल है। क्लस्टर स्तर या छोटे-छोटे इलाकों में ग्रामीण महिलाओं द्वारा उत्पादित सामानों को लेकर समुदाय या समूह आधारित बाजार बनाए जाएंगे। इससे महिलाएं खुद उद्यमी बनकर अपने उत्पाद बेच सकेंगी और किसी भी बिचौलिए की जरूरत नहीं होगी। इससे जहां ग्रामीण महिलाओं के उत्पादों का ब्रांड विकसित होगा, वहीं उनका मुनाफा भी ज्यादा होगा। ग्रामीण महिलाओं की स्थायी आय सुनिश्चित करने और स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने के लिए यह पहल की गई है।
वर्तमान में ग्रामीण विकास मंत्रालय की ‘लखपति दीदी’ योजना के जरिए ग्रामीण स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर सकती हैं। इस योजना का लक्ष्य महिलाओं की सालाना कम से कम एक लाख रुपये की आय सुनिश्चित करना है। इसके तहत महिलाओं को एलईडी बल्ब निर्माण, ड्रोन मरम्मत और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दिया जाता है। इन्हीं महिलाओं को उद्यमी बनाने के उद्देश्य से SHE मार्ट की योजना लाई गई है।
इसी कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा है, “आज का बजट ऐतिहासिक है, जिसमें देश की नारी शक्ति की भागीदारी उल्लेखनीय है।” केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा या शोध से जुड़ी छात्राओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक जिले में एक महिला छात्रावास बनाने की घोषणा भी की गई है। राष्ट्रीय महिला आयोग के लिए बजट आवंटन 2025–26 में 28 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 36 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
बच्चों को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का बजट आवंटन पिछले वर्ष के 24,651.91 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 28,183.06 करोड़ रुपये किया गया है। ‘सक्षम आंगनवाड़ी’ और ‘पोषण’ योजनाओं के लिए 23,100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं (पिछले वित्त वर्ष में यह 21,960 करोड़ रुपये था)। बाल अधिकार संरक्षण आयोग के लिए भी बजट 26.80 करोड़ रुपये से बढ़कर 28.44 करोड़ रुपये हो गया है। हालांकि विपक्ष का दावा है कि ये सभी आवंटन नाममात्र के हैं। उनका सवाल है कि महिलाओं से जुड़ी योजनाओं के भले ही बड़े-बड़े नाम रखे गए हों, लेकिन वास्तव में कितनी महिलाएं इसका लाभ उठा पाएंगी?