नई दिल्ली : 113 साल पुरानी ऐतिहासिक दिल्ली जिमखाना क्लब में भीषण गर्मी की दोपहर के बावजूद एक अजीब-सी खामोशी पसरी हुई है। ‘शोले’ फिल्म के अमर संवाद “इतना सन्नाटा क्यों है भाई?” जैसी स्थिति वहां देखने को मिल रही है। दिल्ली जिमखाना क्लब के भीतर लगभग डेढ़ घंटे बिताने और क्लब में मौजूद व्यवसायियों तथा सदस्यों से बातचीत करने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि केंद्र सरकार के आदेश के बाद कर्मचारियों की स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई है, मानो किसी आरोपी की अंतिम स्थिति जैसी निराशा उनके बीच छा गई हो।
22 मई को आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा भेजे गए पत्र में बताया गया है कि सफदरजंग लेन स्थित दिल्ली जिमखाना क्लब और उसकी 27.3 एकड़ भूमि को सरकार पुनः अपने अधीन लेगी। इसका उद्देश्य रक्षा अवसंरचना का निर्माण बताया गया है। केंद्र सरकार द्वारा लीज रद्द करने की सूचना मिलते ही क्लब प्रबंधन ने तुरंत कानूनी रास्ता अपनाया, लेकिन उसके बाद भी उम्मीद बहुत कम बताई जा रही है। माना जा रहा है कि क्लब और उसकी भूमि अंततः सरकार के हवाले करनी पड़ सकती है। इसी कारण दिल्ली जिमखाना क्लब में कार्यरत लगभग 700 कर्मचारी गहरे संकट में हैं। इनमें स्थायी कर्मचारी और अनुबंध आधारित अस्थायी कर्मचारी दोनों शामिल हैं। कई कर्मचारियों ने हाल ही में बैंक से ऋण लेकर घर खरीदे हैं, जबकि कुछ ने बीमार परिजनों के इलाज के लिए ऋण लिया है। सभी के सामने भविष्य अनिश्चित हो गया है।
दिल्ली जिमखाना क्लब के स्थायी कर्मचारी नितेश कुमार ने कहा, “दो महीने पहले मैंने 30 लाख रुपये का बैंक लोन लेकर एक फ्लैट खरीदा था। अगर अब नौकरी ही नहीं रहेगी तो मैं लोन कैसे चुका पाऊंगा? आज के समय में दिल्ली में अच्छी नौकरी मिलना आसान नहीं है। समझ नहीं आ रहा कि अब कहाँ जाऊँ।”
दिल्ली जिमखाना क्लब के हरे-भरे लॉन और टेनिस कोर्ट पूरे एशिया में प्रसिद्ध हैं। यहां 26 ग्रास कोर्ट और आधा दर्जन क्ले कोर्ट हैं, जिनकी गुणवत्ता को विंबलडन के बराबर माना जाता है। इन टेनिस कोर्ट की देखभाल करने वाले 58 वर्षीय एक माली 2010 से यहां कार्यरत हैं। उन्होंने बताया, “साहब, हमारी तनख्वाह ज्यादा नहीं है, लेकिन हमें मोटा टिप मिलता है। उसी से मैंने अपनी दोनों बेटियों की शादी की है। अब रिटायरमेंट के करीब खड़ा हूँ, अब कहाँ नौकरी मिलेगी? परिवार कैसे चलेगा?”
दिल्ली जिमखाना क्लब के रसोइये नितिन टाम्टा स्थायी कर्मचारी नहीं हैं। वे पिछले 10 वर्षों से दैनिक मजदूरी के आधार पर काम कर रहे हैं। उनके द्वारा बनाए गए कबाब काफी लोकप्रिय हैं। नितिन ने अपनी पक्षाघातग्रस्त मां के इलाज के लिए क्लब प्रबंधन से विशेष ऋण का आवेदन किया था। उन्हें जून महीने में वह राशि मिलने का आश्वासन भी मिला था, लेकिन केंद्र सरकार के आदेश ने सारी उम्मीदें खत्म कर दीं। खाली नजरों से देखते हुए नितिन ने कहा, “मेरी नौकरी रहेगी या नहीं, यह मैं अभी अपनी मां को भी नहीं बता पाया हूँ। मैं भी जैसे अपनी मां की तरह पक्षाघातग्रस्त हो गया हूँ।