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Bengal Election: नंदीग्राम से अभिषेक बनर्जी का ऐलान- “राम के नाम पर राजनीति करने वाले अयोध्या में हारे, बंगाल में भी हारेंगे”

रामनवमी से पहले सियासी बयानबाजी ने पकड़ी रफ्तार। चुनाव से पहले BJP को घेरने की रणनीति में अभिषेक आक्रामक।

कोलकाता/नंदीग्राम: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के जरिए राजनीति तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया पोस्ट ने इस बहस को और हवा दे दी है। रामनवमी से ठीक पहले उन्होंने ‘मां काली’ को समर्पित श्यामा संगीत साझा किया। इससे यही संदेश पहुंचाने की कोशिश की जा रही कि भाजपा केवल ‘राम’ ही नहीं, ‘काली’ की भक्ति को भी बराबर महत्व दे रही है। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भाजपा की इस रणनीति पर सीधा हमला बोला है। नंदीग्राम में एक जनसभा के दौरान उन्होंने कहा कि जो लोग भगवान राम के नाम पर राजनीति करते हैं, उन्हें अयोध्या में भी हार का सामना करना पड़ा। नंदीग्राम में आयोजित सभा में अभिषेक ने दावा किया कि बंगाल की जनता भी भाजपा को उसी तरह जवाब देगी। उनका कहना था कि धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक हथियार बनाकर लोगों को लंबे समय तक प्रभावित नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि नवरात्रि के सातवें दिन पीएम मोदी ने अपने एक्स (ट्विटर) हैंडल पर “काली काली बोल रसना” गीत पोस्ट करते हुए लिखा कि मां की आराधना से भक्तों को नई ऊर्जा और आत्मविश्वास मिलता है। एक अन्य पोस्ट में उन्होंने “मां कालरात्रि” को नमन करते हुए सभी के जीवन में साहस और सफलता की कामना की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संदेश ऐसे समय में आया है जब बंगाल में रामनवमी को लेकर भाजपा बड़े स्तर पर आयोजन की तैयारी कर रही है। ऐसे में काली भक्ति को सामने लाकर भाजपा बंगाली हिंदुओं से भावनात्मक जुड़ाव मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

इससे पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल हमेशा से सभी धर्मों को साथ लेकर चलने वाला राज्य रहा है। उन्होंने कहा कि “रामनवमी भी मनाई जाएगी, बसंती पूजा भी। यहां हर त्योहार सबका है।” ममता ने यह भी स्पष्ट किया कि “राम किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं हैं।”

हिंदुत्व बनाम बंगाली पहचान – चुनाव का नया रुख

पश्चिम बंगाल की राजनीति में अभी दो अलग तरह की सोच आमने-सामने हैं। एक तरफ भाजपा धार्मिक एकजुटता और हिंदुत्व के मुद्दे को जोर दे रही है, वहीं तृणमूल कांग्रेस बंगाली संस्कृति और स्थानीय पहचान को अहमियत देकर इसका मुकाबला कर रही है।

तृणमूल लगातार भाजपा को “बंगाल और बंगाली विरोधी” बताने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए काली, दुर्गा जैसे बंगाल के प्रमुख देवी-देवताओं के प्रति अपनी आस्था को प्रमुखता से दिखा रही है।

हाल के दिनों में भाजपा नेताओं के भाषणों में “जय मां काली” के नारे तेज हुए हैं। यहां तक कि पार्टी की रैलियों और मंचों की डिजाइन में भी काली मंदिर की झलक देखने को मिली है।

भाजपा की रणनीति: ‘डबल धार्मिक कनेक्ट’

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा इस बार बंगाल में “डबल धार्मिक कनेक्ट” की रणनीति पर काम कर रही है-एक तरफ रामनवमी के जरिए व्यापक हिंदुत्व की अपील, तो दूसरी ओर काली भक्ति के जरिए स्थानीय सांस्कृतिक जुड़ाव।

इसी रणनीति के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में बंगालवासियों को लिखे पत्र की शुरुआत भी “जय मां काली” से की थी। इससे पहले ब्रिगेड ग्राउंड की रैली में मंच को दक्षिणेश्वर काली मंदिर की तर्ज पर तैयार किया गया था।

चुनाव से पहले बढ़ा ध्रुवीकरण

विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा की कोशिश है कि धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए हिंदू वोटों को एकजुट किया जाए। वहीं तृणमूल क्षेत्रीय अस्मिता और समावेशी संस्कृति के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है। ऐसे में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 अब केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि यह पहचान, संस्कृति और विचारधारा की लड़ाई बनता जा रहा है। रामनवमी से पहले शुरू हुई यह सियासी जंग आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत दे रही है।

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