भुवनेश्वरः ओडिशा में राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। संभावित क्रॉस-वोटिंग की आशंका के बीच कांग्रेस ने एहतियातन अपने छह विधायकों को बेंगलुरु भेज दिया है। ये विधायक दक्षिण बेंगलुरु के एक निजी रिसॉर्ट में ठहरे हुए हैं, जहां कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार उनकी निगरानी कर रहे हैं।
बेंगलुरु पहुंचे विधायकों में अशोक कुमार दास, प्रफुल्ल चंद्र प्रधान, पबित्र साउंटा, कद्रका अप्पला स्वामी, सीएस राजेन एका और सत्यजीत गोमांगो शामिल हैं। इनके साथ परिवार के सदस्य भी गए हैं और कुल 14 लोग ओडिशा से बेंगलुरु पहुंचे हैं।
कांग्रेस का यह कदम दर्शाता है कि पार्टी इस चुनाव को लेकर बेहद सतर्क है और मतदान तक अपने विधायकों को एकजुट बनाए रखना चाहती है। भारतीय राजनीति में ऐसे कदमों को आमतौर पर “रिसॉर्ट राजनीति” कहा जाता है, जो अक्सर करीबी चुनावों के दौरान देखने को मिलती है।
विधानसभा का गणित और राज्यसभा की चार सीटें
ओडिशा से अप्रैल 2026 में राज्यसभा की चार सीटें खाली हो रही हैं। इन सीटों के लिए 16 मार्च को मतदान होगा और उसी दिन शाम पांच बजे मतगणना की जाएगी।
एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, 147 सदस्यीय विधानसभा में मौजूदा संख्या बल चुनाव के परिणामों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा। वर्तमान स्थिति के अनुसार भाजपा के पास 79 विधायक हैं और तीन निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी उसे प्राप्त है, जिससे उसका कुल आंकड़ा 82 तक पहुंचता है। बीजद के पास लगभग 48 से 50 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास 14 और सीपीआई(एम) के पास एक विधायक है।
राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए लगभग 37 से 38 प्राथमिक वोटों की जरूरत होती है। इस गणित के आधार पर भाजपा दो सीटें आसानी से जीत सकती है, जबकि बीजद एक सीट सुरक्षित कर सकती है। असली मुकाबला चौथी सीट को लेकर बनता दिख रहा है।
उम्मीदवारों के बीच मुकाबला
राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा ने मनमोहन समाल और सुजीत कुमार को उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप रे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं, जिन्हें भाजपा का समर्थन प्राप्त है।
बीजद ने संत्रुप्त मिश्रा और डॉ. दत्तेश्वर होता को उम्मीदवार बनाया है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस और सीपीआई(एम) ने डॉ. होता को समर्थन देने का फैसला किया है।
ओडिशा कांग्रेस अध्यक्ष भक्त चरण दास का कहना है कि डॉ. होता किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं और वे राज्य के प्रतिष्ठित चिकित्सक तथा शिक्षाविद हैं। इसलिए उन्हें एक व्यापक स्वीकार्यता वाले उम्मीदवार के रूप में समर्थन दिया जा रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी इस निर्णय को मौजूदा परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे संभावित घोड़ेबाजारी की संभावना को रोका जा सकता है।
चौथी सीट बनी असली राजनीतिक परीक्षा
नामांकन प्रक्रिया 5 और 6 मार्च को पूरी हो चुकी है और कुल पांच उम्मीदवार मैदान में हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चौथी सीट के लिए दिलीप रे और डॉ. दत्तेश्वर होता के बीच सीधी टक्कर है।
यदि कांग्रेस के 14 वोट और बीजद के अतिरिक्त वोट होता के पक्ष में जाते हैं, तो यह भाजपा की तीसरी सीट की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि कांग्रेस ने अपने विधायकों को सुरक्षित स्थान पर रखकर किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से बचने की कोशिश की है।
राष्ट्रीय राजनीति में भी नजर
16 मार्च को देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों पर मतदान होना है। ऐसे में ओडिशा का चुनाव केवल राज्य की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके संकेत देखे जा रहे हैं। भाजपा के सत्ता में आने के बाद ओडिशा की राजनीति नए समीकरणों की ओर बढ़ रही है। वहीं विपक्षी दल इस चुनाव में रणनीतिक सहयोग के जरिए भाजपा को अतिरिक्त बढ़त से रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
ऐसे में ओडिशा की चौथी राज्यसभा सीट केवल एक संसदीय सीट का चुनाव नहीं, बल्कि राज्य की बदलती राजनीतिक दिशा का संकेत भी बन गई है।