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नेपाल में अशांति के दौरान मारी गई भारतीय महिला के लिए 100 करोड़ मुआवज़े की याचिका

दिल्ली हाईकोर्ट ने फिर से सूचीबद्ध की; 9 फ़रवरी को होगी सुनवाई

By डॉ. अभिज्ञात

Feb 05, 2026 19:55 IST

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने नेपाल में हुई हिंसक नागरिक अशांति के दौरान जान गंवाने वाली एक भारतीय महिला की मौत को लेकर जवाबदेही और मुआवज़े की मांग करने वाली रिट याचिका की सुनवाई की तारीख़ पुनर्निर्धारित कर 9 फ़रवरी 2026 कर दी है। यह याचिका पीड़ित महिला के पति द्वारा दायर की गई है। गुरुवार को यह मामला इसलिए नहीं सुना जा सका क्योंकि जिस पीठ को इसकी सुनवाई करनी थी, वह गठित नहीं हो सका। न्यायमूर्ति पुरुषैंदर कुमार कौरव को इस याचिका की सुनवाई करनी थी।

याचिका में भारत सरकार, संबंधित संवैधानिक प्राधिकरणों और काठमांडू स्थित एक लक्ज़री अंतरराष्ट्रीय होटल के प्रबंधन से 100 करोड़ रुपये के संवैधानिक मुआवज़े की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि 9 सितंबर 2025 को ‘जेन ज़ेड विरोध प्रदर्शन’ के दौरान दिवंगत राजेश गोला की मृत्यु “टालने योग्य और पूरी तरह रोकी जा सकने वाली” थी। यह रिट याचिका उनके पति रामबीर सिंह गोला ने अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के पीआईएल कार्यकर्ता अभिषेक चौधरी के माध्यम से दायर की है।

याचिका के अनुसार, दंपति 7 सितंबर 2025 को पशुपतिनाथ मंदिर में धार्मिक यात्रा के उद्देश्य से नेपाल गए थे और काठमांडू के एक प्रतिष्ठित पाँच सितारा होटल में ठहरे थे, जहाँ उन्होंने होटल द्वारा दिए गए सुरक्षा और संरक्षण के आश्वासनों पर भरोसा किया था। काठमांडू में विरोध-प्रदर्शनों, आगज़नी और व्यापक अशांति के साथ हिंसा बढ़ने के बावजूद होटल प्रबंधन कथित तौर पर मेहमानों को यह भरोसा देता रहा कि स्थिति नियंत्रण में है। याचिकाकर्ता का दावा है कि उन्हें होटल छोड़ने से हतोत्साहित किया गया और बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के आश्वासन के साथ उन्हें ऊपरी मंज़िल पर शिफ्ट होने के लिए राज़ी किया गया-जो बाद में घातक रूप से भ्रामक साबित हुआ।

9 सितंबर की रात एक हिंसक भीड़ ने कथित तौर पर होटल परिसर में घुसकर इमारत के कुछ हिस्सों में आग लगा दी। याचिका के अनुसार जब होटल में धुआँ भर गया और मेहमानों में अफ़रा-तफ़री मच गई तो आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र पूरी तरह विफल हो गया। दावा किया गया है कि न तो फ़ायर अलार्म सक्रिय किए गए न ही निकासी प्रोटोकॉल का पालन हुआ और न ही कोई सहायता उपलब्ध कराई गई; बल्कि होटल कर्मचारियों ने कथित तौर पर परिसर छोड़ दिया।

याचिकाकर्ता ने आगे आरोप लगाया कि उन्होंने काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय से तत्काल सहायता के लिए बार-बार आपात कॉल कीं लेकिन फँसे हुए भारतीय नागरिकों के लिए कोई कांसुलर हस्तक्षेप, बचाव समन्वय या आपात सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई। तत्काल ख़तरे और बंद निकासी मार्गों के बीच याचिकाकर्ता और उनकी पत्नी ने कथित तौर पर अस्थायी रस्सियों की मदद से बाहर निकलने की कोशिश की। इसी प्रयास के दौरान दिवंगत राजेश गोला चौथी मंज़िल से गिर पड़ीं और गंभीर रूप से घायल हो गईं। बाद में उन्हें समय पर और पर्याप्त चिकित्सा उपचार से वंचित किया गया, एक स्थानीय अस्पताल में उन्हें ग़लत तरीके से मृत घोषित कर दिया गया और आवश्यक चिकित्सा देखभाल के बिना मुर्दाघर में छोड़ दिया गया, जिससे याचिकाकर्ता के अनुसार, उनकी मृत्यु हो गई। बताया गया है कि नेपाल सरकार ने इस घटना को हत्या का मामला दर्ज किया है।

याचिका में कहा गया है कि नेपाल की अशांति के दौरान जान गंवाने वाली वह एकमात्र भारतीय नागरिक थीं, जिससे अंतरराष्ट्रीय आतिथ्य सेवा प्रदाताओं की सुरक्षा ज़िम्मेदारियों और विदेश में भारतीय नागरिकों की रक्षा करने की भारतीय राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल उठते हैं। 22 सितंबर 2025 को विस्तृत कानूनी नोटिस जारी किए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता का दावा है कि संबंधित प्राधिकरणों द्वारा अब तक कोई जांच, मुआवज़ा तंत्र या जवाबदेही प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है। याचिका के माध्यम से अदालत की निगरानी में न्यायिक जांच, दोषी अधिकारियों और संस्थानों की ज़िम्मेदारी तय करने, दोष सिद्ध होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तथा भारत सरकार और संबंधित होटल प्रबंधन से संयुक्त रूप से 100 करोड़ रुपये के संवैधानिक मुआवज़े की मांग की गई है।

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