नई दिल्ली: लोकसभा ने विपक्ष के ज़ोरदार विरोध के बीच एक अभूतपूर्व घटनाक्रम में गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परंपरागत भाषण के बिना ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर दिया। जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने धन्यवाद प्रस्ताव पर विपक्ष द्वारा पेश किए गए संशोधनों को मतदान के लिए रखा, उस समय प्रधानमंत्री सदन में मौजूद नहीं थे। ये सभी संशोधन खारिज कर दिए गए।
इसके बाद अध्यक्ष ने 28 जनवरी को संसद के दोनों सदनों को दिए गए राष्ट्रपति के अभिभाषण के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पढ़कर सुनाया, जिसे विपक्षी सदस्यों की नारेबाज़ी के बीच ध्वनिमत (वॉयस वोट) से पारित कर दिया गया। विरोध जारी रहने पर अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही दोपहर 2:00 बजे तक के लिए स्थगित कर दी।
कांग्रेस के सदस्य प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर और ऊपर ‘नरेंद्र–सरेंडर’ लिखे पोस्टर लेकर वेल में आ गए। समाजवादी पार्टी के सदस्य भी वेल में मौजूद थे। वे तीन बैनर और पर्चे लेकर आए थे, जिनमें वाराणसी में गंगा नदी के मणिकर्णिका घाट पर किए गए ध्वस्तीकरण का मुद्दा उठाया गया था। सपा के बैनरों पर रानी अहिल्याबाई होल्कर की तस्वीरें थीं, जिन्होंने लगभग 300 साल पहले इन घाटों का विकास कराया था।
तृणमूल कांग्रेस के सदस्य भी विरोध में शामिल होते हुए वेल में आ गए, जबकि डीएमके और वाम दलों समेत इंडिया गठबंधन के अन्य सदस्य अपनी सीटों पर और सदन की गलियारे में खड़े होकर एकजुटता जताते रहे।
संवैधानिक विशेषज्ञ पी. डी. टी. आचार्य ने प्रधानमंत्री के परंपरागत जवाब के बिना राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित किए जाने को “अभूतपूर्व घटनाक्रम” बताया। लोकसभा के पूर्व महासचिव आचार्य ने कहा कि वर्ष 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सदन में मौजूद थे, लेकिन तत्कालीन विपक्ष भाजपा के साथ बनी सहमति के अनुसार उन्होंने भाषण नहीं दिया था।
10 जून 2004 को मनमोहन सिंह ने कहा था,“माननीय अध्यक्ष महोदय, मुझे ज्ञात हुआ है कि दोनों पक्षों के राजनीतिक दलों के बीच यह सहमति बनी है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को सीधे मतदान के लिए रखा जाए और सर्वसम्मति से पारित किया जाए। अतः मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि प्रस्ताव को मतदान के लिए रखें।”