रायरंगपुरः राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का ओडिशा दौरा एक बार फिर यह याद दिलाता है कि संवैधानिक पदों की गरिमा के पीछे भी एक ऐसा मन होता है, जो स्मृतियों, पीड़ा और रिश्तों से बंधा होता है। अपने पैतृक गांव पहाड़पुर पहुंचकर जब उन्होंने अपने दिवंगत पति श्याम चरण मुर्मू की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया, तो वह क्षण केवल औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं था, बल्कि एक पत्नी, एक मां और एक साधारण आदिवासी महिला के टूटे-बिखरे जीवन अनुभवों का मौन संवाद था।
राष्ट्रपति का जीवन व्यक्तिगत त्रासदियों से भरा रहा है-पति और दोनों पुत्रों का असमय निधन, मां और भाई को खोने का दर्द। इन घावों के बीच उन्होंने शोक को सेवा में बदला। पति और बेटों की स्मृति में बना एसएलएस मेमोरियल आज सैकड़ों वंचित और अनाथ बच्चों के लिए आशा का केंद्र है। यह स्मारक राष्ट्रपति मुर्मू की उस सोच का प्रतीक है, जिसमें दुख आत्मविलाप नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व में बदल जाता है।
धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान इस यात्रा की दूसरी मजबूत कड़ी रही। जाजपुर और पुरी में पिंडदान कर उन्होंने अपने प्रियजनों की आत्मा की शांति के लिए परंपराओं का निर्वहन किया, वहीं रायरंगपुर के जगन्नाथ मंदिर में ब्राह्मण भोज ने उनकी आस्था को सार्वजनिक रूप दिया। इसके समानांतर, संथाल समुदाय के पवित्र स्थल ‘जाहिरा’ में मरांग बुरु देवता की पूजा ने यह स्पष्ट किया कि उनकी जड़ें आज भी आदिवासी परंपराओं में गहराई से जुड़ी हैं।
सुरक्षा व्यवस्था में तैनात कमांडो का आदिवासी वेश में जाहिरा में प्रवेश करना केवल प्रोटोकॉल नहीं, बल्कि यह संदेश था कि सत्ता भी स्थानीय संस्कृति के सामने विनम्र हो सकती है। सड़क के दोनों ओर खड़ी आदिवासी महिलाएं, पारंपरिक नृत्य करते कलाकार और तिरंगा लहराते बच्चे-यह स्वागत किसी राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि “मिट्टी की बेटी” का था।
सिमिलिपाल राष्ट्रीय उद्यान के वन विश्रामगृह में रात्रि प्रवास और अगले दिन आदिवासी महिलाओं व युवाओं से संवाद, साथ ही जरूरतमंद वनवासियों को कंबल वितरण-यह सब बताता है कि यह यात्रा विकास या घोषणाओं की नहीं, बल्कि भरोसे और अपनत्व की थी।
यह दौरा एक गहरा संदेश छोड़ता है-नेतृत्व केवल निर्णय लेने की क्षमता नहीं, बल्कि लोगों के दुख-दर्द को महसूस करने की संवेदनशीलता भी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का यह प्रवास उसी मानवीय नेतृत्व का जीवंत उदाहरण बन गया।