अमित चक्रवर्ती
नई दिल्ली: पति-पत्नी अलग रहने लगें और अंततः उनका तलाक हो जाए तो नाबालिग बच्चों की देखभाल में मां को प्राथमिकता देने की पारंपरिक धारणा को बदलने का संदेश दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया है। बंगाल के एक दंपति के दो नाबालिग बच्चों एक बेटा और एक बेटी को उनके पिता के पास रखने के दिल्ली की एक निचली अदालत के आदेश पर मुहर लगाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने यह संदेश दिया।
सामान्य तौर पर वैवाहिक विवादों में नाबालिग बच्चों को मां के पास देना एक स्वाभाविक बात मानी जाती रही है लेकिन बच्चों की कस्टडी से जुड़े एक मामले में हाल ही में पटियाला हाउस कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरिश वैद्यनाथन शंकर की डिवीजन बेंच ने कहा कि नाबालिग संतानों की अभिरक्षा में मां को प्राथमिकता देने की धारणा का यांत्रिक प्रयोग बदलने का समय आ गया है। अदालत ने टिप्पणी की कि यह धारणा पुराने सामाजिक-आर्थिक ढांचे पर आधारित थी, जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप नहीं है इसलिए अभिभावकत्व तय करते समय मातृत्व को ही स्वाभाविक प्राथमिकता देना अब स्वीकार्य नहीं है।
अब तक मां के पास रह रहे दोनों बच्चों को पिता के पास देने के पटियाला हाउस कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवाद में मां ने बच्चों को गलत समझाकर पिता के खिलाफ भड़काने की कोशिश की। अदालत ने कहा कि निचली अदालत के फैसले को रद्द करना मां द्वारा लगातार किए गए पेरेंटल एलियनेशन को बढ़ावा देना होगा। दीर्घकालिक वैवाहिक विवाद में बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें पिता के पास देने के फैसले में हाई कोर्ट ने वैवाहिक क्रूरता, पेरेंटल एलियनेशन और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग के आरोपों को महत्व दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के विवाद के दौरान 12 वर्ष के बेटे और 6 वर्ष की बेटी को एक-दूसरे का सहारा मिलता है और इसलिए दोनों को पिता के पास ही रखा जाए।
इस प्रकार निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली मां की याचिका दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दी। हालांकि निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट ने मां को बच्चों से मिलने और संपर्क का अधिकार भी दिया है।
अदालत सूत्रों के अनुसार उच्च शिक्षा के दौरान उत्तर 24 परगना के हाबरा में दोनों की पहचान हुई थी। पहचान से प्रेम और फिर सितंबर 2011 में विवाह हुआ। 2013 में बेटा और 2019 में बेटी का जन्म हुआ। वे 2018 तक साथ रहे। पति के अनुसार सितंबर 2018 में पत्नी नौकरी पर जाने की बात कहकर घर से निकली और बाद में बताया कि वह सिलीगुड़ी में मायके लौट गई है। उस समय वह बेटे को पति के पास छोड़ गई थी लेकिन एक सप्ताह बाद वह अपने माता-पिता और अन्य लोगों के साथ आकर बेटे को जबरन ले गई, ऐसा पति का आरोप है। वहीं पत्नी का आरोप है कि उसे शारीरिक प्रताड़ना, गाली-गलौज और मानसिक उत्पीड़न सहना पड़ा। चार महीने की गर्भवती होने पर भी उस पर हमला किया गया, जिसके कारण उसे ससुराल छोड़ना पड़ा। महिला ने सिलीगुड़ी अदालत में मामला दर्ज किया। हालांकि दस्तावेजों की जांच के बाद अदालत ने घरेलू हिंसा का मामला खारिज करते हुए विवाहित महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के दुरुपयोग पर नाराजगी जताई। दूसरी ओर उस व्यक्ति को कलकत्ता हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत मिली। बाद में महिला नौकरी लेकर दिल्ली चली गई। उसके आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट ने मामला दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट स्थानांतरित करने का निर्देश दिया।
उस अदालत में तलाक के मामले के साथ बच्चों की कस्टडी का मामला भी चल रहा था। पटियाला हाउस कोर्ट ने बच्चों को पिता के पास रखने का आदेश दिया तो मां ने उसे दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। इस मामले में मुख्य प्रश्न यह था कि क्या अदालत ने गलती से बच्चों को केवल पिता के पास रखने का आदेश दिया। क्या बच्चे के सर्वोत्तम हित के सिद्धांत का सही ढंग से पालन किया गया। इन सभी प्रश्नों का उत्तर देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश बरकरार रखा।