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मानकों के उल्लंघन पर श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज की मान्यता रद्द, फ़ैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं

भारतीय जनता पार्टी और विरोध कर रहे समूहों ने इस कदम का स्वागत किया है, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने इसे एक बड़ा झटका बताया है।

By डॉ. अभिज्ञात

Jan 07, 2026 19:53 IST

नयी दिल्लीः राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस, काकरीयाल (रियासी, जम्मू-कश्मीर) को एमबीबीएस पाठ्यक्रम चलाने की दी गई अनुमति वापस ले ली है। यह फैसला 6 जनवरी 2026 से तत्काल प्रभाव से लागू हुआ है। आयोग ने यह कार्रवाई न्यूनतम मानकों का पालन न होने के कारण की है, जो एक औचक निरीक्षण में सामने आया।

निरीक्षण में कॉलेज में शिक्षकों की भारी कमी, अपर्याप्त क्लीनिकल सुविधाएं, कम मरीज संख्या, अधूरी प्रयोगशालाएं, लाइब्रेरी में किताबों और जर्नलों की कमी, ऑपरेशन थिएटर और अन्य बुनियादी ढांचे की गंभीर खामियां पाई गईं। इन कमियों को नियमों का उल्लंघन माना गया।

हालांकि, आयोग ने पहले से दाख़िला ले चुके छात्रों के हितों की रक्षा की है। शैक्षणिक सत्र 2025-26 में दाख़िला पाए सभी छात्रों को जम्मू-कश्मीर के अन्य मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों में अतिरिक्त सीटों पर समायोजित किया जाएगा ताकि किसी छात्र का एमबीबीएस दाख़िला न छिने।

मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम शुरू करने की दी गई अनुमति वापस लेने के एनएमसी के फ़ैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। भारतीय जनता पार्टी और विरोध कर रहे समूहों ने इस कदम का स्वागत किया है, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने इसे एक बड़ा झटका बताया है। भाजपा समर्थित दक्षिणपंथी संगठनों का एक नया गठबंधन 'संघर्ष समिति’ नवंबर से जम्मू में आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था। यह समिति श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस में हुए दाख़िलों को रद्द करने और माता वैष्णो देवी में आस्था रखने वाले छात्रों के लिए विशेष रूप से सीटें आरक्षित करने की मांग कर रही थी। यह समिति उस समय बनी थी जब नीट मेरिट सूची के ज़रिये 50 छात्रों के पहले एमबीबीएस बैच में दाख़िले पूरे हो चुके थे। इनमें से 42 छात्र मुस्लिम थे, जिनमें अधिकतर कश्मीर से थे, जबकि सात छात्र जम्मू के हिंदू थे और एक सिख छात्र था।

जम्मू-कश्मीर भाजपा अध्यक्ष सत शर्मा ने उन समूहों को इसका श्रेय दिया, जो दाख़िले रद्द करने की मांग कर रहे थे और कहा कि यह संस्थान हिंदुओं के दान से चलाया जाता है। समिति के संयोजक कर्नल (सेवानिवृत्त) सुखवीर सिंह मनकोटिया ने कहा, “हम अपना 45 दिनों का सफल आंदोलन समाप्त करते हैं लेकिन हम श्राइन बोर्ड की गतिविधियों पर नज़र रखेंगे। श्राइन बोर्ड को केवल हिंदुओं के कल्याण के लिए काम करना चाहिए और सरकारी कामकाज में दख़ल नहीं देना चाहिए।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने कॉलेज की मान्यता रद्द किए जाने को लेकर भाजपा की आलोचना की और इसे ‘विभाजन की राजनीति’ बताया। जम्मू-कश्मीर के जल शक्ति और जनजातीय मामलों के मंत्री जावेद राणा ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है। लोग मंदिर-मस्जिद के नाम पर राजनीति करते रहे हैं, लेकिन आज हम बड़े संस्थानों में दाख़िले को धर्म और क्षेत्र के आधार पर राजनीति का विषय बना रहे हैं।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने कहा कि “संवैधानिक संस्थाएं दक्षिणपंथी दबाव में आ रही हैं। एनएमसी ने पहले उसी कॉलेज को अनुमति दी और एक महीने बाद उसे वापस ले लिया।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के मीडिया प्रभारी (पीर पंजाल) विवेक शर्मा ने कहा कि ‘विभाजनकारी राजनीति’ से प्रेरित आंदोलन, जो मुस्लिम छात्रों को झूठे नैरेटिव के ज़रिये निशाना बना रहा था, अंततः हिंदू छात्रों के लिए भी नुकसानदेह साबित हुआ। पीडीपी विधायक वहीद पारा ने कहा कि यह कदम देशभर के अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ बेहद नकारात्मक संदेश देता है। पीडीपी प्रवक्ता आदित्य गुप्ता ने कहा कि इस मामले में भाजपा और नेशनल कॉन्फ्रेंस दोनों ज़िम्मेदार हैं। यह जम्मू के लिए बड़ा झटका है और क्षेत्र के लोगों के साथ भाजपा के विश्वासघात को दर्शाता है।”

जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रमन भल्ला ने कहा कि इस फ़ैसले से छात्रों को उन्नत चिकित्सा शिक्षा से वंचित होना पड़ा, स्वास्थ्य ढांचा कमज़ोर हुआ और रोज़गार के संभावित अवसर बंद हो गए।

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