पुणेः पर्यावरण की चेतना से जुड़ी एक विभूति खो गयी। भारतीय पर्यावरण आंदोलन की मजबूत आवाज, प्रख्यात पर्यावरणविद् और पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल अब हमारे बीच नहीं रहे। 7 जनवरी 2026 की रात करीब 11 बजे महाराष्ट्र के पुणे में उन्होंने अंतिम सांस ली। 83 वर्ष की आयु में एक संक्षिप्त बीमारी के बाद पुणे के प्रयाग अस्पताल में उनका निधन हुआ। उनके जाने से देश ने न सिर्फ एक वैज्ञानिक खोया बल्कि प्रकृति, जैव विविधता और आम लोगों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले एक संवेदनशील विचारक को भी विदा कर दिया।
माधव गाडगिल का नाम पश्चिमी घाटों के संरक्षण के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा। यही वह क्षेत्र है, जहां उनके शोध और सोच ने भारत की पर्यावरण नीति को नई दिशा दी। बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) में इकोलॉजिकल साइंसेज़ सेंटर की स्थापना कर उन्होंने पर्यावरण अध्ययन को एक सशक्त आधार दिया। वर्ष 2009 से 2011 के बीच वे वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल के अध्यक्ष रहे, जिसे देश आज ‘गाडगिल आयोग’ के नाम से जानता है। इस आयोग की रिपोर्ट को वैज्ञानिक मजबूती, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण का दुर्लभ उदाहरण माना जाता है। यही वजह थी कि लोग उन्हें स्नेह से ‘धरती पुत्र’ कहने लगे।
उनका जीवन आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के बीच सेतु बनाने का प्रयास था। 1970 और 80 के दशक में सेव साइलेंट वैली आंदोलन से लेकर 1980 के दशक में बस्तर के जंगलों की रक्षा तक उन्होंने हर उस जगह अपनी आवाज बुलंद की, जहां प्रकृति खतरे में थी। उनका काम केवल शोध तक सीमित नहीं रहा बल्कि नीतियों और जनआंदोलनों में भी गहरी छाप छोड़ गया।
गाडगिल के योगदान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी सम्मान मिला। वर्ष 2024 में संयुक्त राष्ट्र ने पश्चिमी घाट जैसे वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट में उनके असाधारण कार्य के लिए उन्हें ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ पुरस्कार से सम्मानित किया, जो पर्यावरण के क्षेत्र में दिया जाने वाला सर्वोच्च वैश्विक सम्मान है। इसके अलावा उन्हें पद्म भूषण सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने उन्हें प्रकृति और सामाजिक न्याय के लिए करुणामय आवाज बताया और कहा कि उनका जीवन कार्य आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी गहरा दुख जताते हुए कहा कि माधव गाड़गिल भारत की पारिस्थितिकी सोच की सबसे प्रभावशाली आवाजों में से एक थे और उनके जाने से देश के हरित आंदोलन को अपूरणीय क्षति पहुंची है।