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भारत में मानसून का स्वरूप बदल रहा है: ‘अटलांटिक कोल्ड ब्लॉब’ का प्रभाव

जलवायु परिवर्तन, जेट स्ट्रीम और मानसून पूर्वानुमान की चुनौतियाँ

नई दिल्ली : यह सवाल अब तेजी से उठने लगा है कि क्या भारत में दक्षिण–पश्चिम मानसूनी हवाएँ अपनी दिशा धीरे–धीरे बदल रही हैं? क्या जून से सितंबर तक के चार महीनों में होने वाली वर्षा का वितरण भी इस बदली हुई प्रवाह-प्रणाली का असर दिखाने लगा है? कई वर्षों से देश के विभिन्न राज्यों में वर्षा के पैटर्न का विश्लेषण करने के बाद मौसम वैज्ञानिक इसी दिशा में संकेत पा रहे हैं।

वैज्ञानिकों का अवलोकन है कि गंगा के मैदानी क्षेत्र में वर्षा की मात्रा धीरे-धीरे कम हो रही है, जबकि उत्तर–पश्चिम भारत में मानसून के चार महीनों के दौरान बारिश में वृद्धि देखी जा रही है। लेकिन इस बदलाव के पीछे कारण क्या है? इसके लिए भारत से लगभग 10,000 किलोमीटर दूर स्थित ग्रीनलैंड के आसपास अटलांटिक महासागर के ऊपर बने एक असामान्य ठंडे जल-क्षेत्र को जिम्मेदार माना जा रहा है।

इस ठंडे समुद्री हिस्से को “अटलांटिक कोल्ड ब्लॉब” कहा जाता है। वैज्ञानिक इस बात से हैरान हैं कि कैसे कोई महासागरीय क्षेत्र इतनी दूरी पर स्थित भारत के मौसम को प्रभावित कर सकता है—जैसे किसी जगह की गतिविधि लगभग 10,000 किलोमीटर दूर जलवायु पर असर डाल रही हो।

पिछले लगभग पच्चीस वर्षों के अध्ययन में यह पाया गया है कि भारत की दक्षिण–पश्चिम मानसूनी प्रणाली के व्यवहार में स्पष्ट परिवर्तन आ रहे हैं। उत्तर–पश्चिम भारत में पहले की तुलना में अधिक वर्षा दर्ज की जा रही है, जबकि दूसरी ओर गंगा–यमुना के मैदानी क्षेत्र में वर्षा की कमी के कारण सूखे का जोखिम बढ़ता जा रहा है। यह क्षेत्र अत्यंत उपजाऊ है और यहाँ बड़े पैमाने पर खाद्यान्न तथा कृषि उत्पादन होता है, इसलिए लगभग 150 करोड़ लोग इस गंगा के मैदान पर निर्भर हैं।

इसके अलावा भारत और दक्षिण एशिया के कई सौ करोड़ लोगों की आर्थिक स्थिरता भी मुख्यतः दक्षिण–पश्चिम मानसून से होने वाली वर्षा पर निर्भर करती है। ऐसे में विशेषज्ञों की चिंता है कि यदि मानसूनी हवाओं का मार्ग बदलता रहा और वर्षा का वितरण असंतुलित होता गया, तो दक्षिण एशिया में गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। हालांकि, मानसून के व्यवहार और उसकी दिशा में बदलाव का सटीक पूर्वानुमान लगाना वैज्ञानिकों के लिए अब भी चुनौती बना हुआ है, क्योंकि वर्तमान जलवायु मॉडल कई बदलावों को ठीक से पकड़ नहीं पा रहे हैं।

अमेरिकी भूभौतिकीय संघ की पूरी तरह ओपन-एक्सेस वैज्ञानिक पत्रिका “एजीयू एडवांसिस” में प्रकाशित एक शोध पत्र में यह दिखाया गया है कि मौजूदा जलवायु मॉडल अटलांटिक महासागर के तापमान में होने वाले बदलाव और उनके वैश्विक मौसमीय प्रभावों को पूरी तरह सही ढंग से दर्शाने में असफल रहते हैं। इसी कारण मानसूनी परिवर्तन के पूर्वानुमान में भी कमी रह जाती है। इसी संदर्भ में “कोल्ड ब्लॉब” का उल्लेख सामने आता है।

विशेषज्ञों के अनुसार “कोल्ड ब्लॉब” ग्रीनलैंड के दक्षिण में अटलांटिक महासागर का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ समुद्री जल का तापमान असामान्य रूप से कम रहता है। शोधकर्ताओं ने जब इसे जलवायु मॉडलों में शामिल किया, तो पाया गया कि यह जेट स्ट्रीम के मार्ग को प्रभावित कर सकता है।

जेट स्ट्रीम क्या है? यह पृथ्वी की सतह से लगभग 9 से 16 किलोमीटर ऊपर बहने वाली बहुत तेज गति की संकरी लेकिन लंबी वायुप्रवाह धारा होती है, जिसे एक तरह से “हवा की नदी” भी कहा जा सकता है।

इसके प्रभाव से वातावरण की नमी अधिक मात्रा में उत्तर–पश्चिम भारत की ओर स्थानांतरित हो जाती है। साथ ही कुछ अन्य क्षेत्रों में तूफान और वर्षा प्रणाली बनने की संभावना भी घट जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के वर्षों में भारत के मानसून व्यवहार में जो परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं, यह व्याख्या उनसे पूरी तरह मेल खाती है।

जब बड़े पैमाने पर वायुप्रवाह का स्वरूप छोटे स्तर की मौसम प्रणालियों के विकास को बाधित करता है, तो इसे “बैरो ट्रॉपिक गवर्नर मैकेनिज्म” कहा जाता है। यह सिद्धांत हाल के समय में भारत जैसे मध्य-अक्षांशीय क्षेत्रों में बढ़ती तूफानी गतिविधियों को समझाने में भी सहायक माना जा रहा है।

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