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ट्रम्प ने शुरू किया ‘बोर्ड ऑफ पीस’, कौन-कौन देश जुड़े और अब भारत क्या करेगा?

गाजा में शांति स्थापना प्राथमिक लक्ष्य, या ट्रम्प के इरादे हैं कुछ और? क्या यह पहल सीधे संयुक्त राष्ट्र को चुनौती देगी?

By कौशिक भट्टाचार्य, Posted by: श्वेता सिंह

Jan 23, 2026 16:59 IST

दावोसः अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड के दावोस से ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की शुरुआत की। इस अवसर पर ट्रम्प ने मुस्कुराते हुए शांति संधि पर हस्ताक्षर किए और पत्रकारों को दिखाई। कुछ मित्र देशों के राष्ट्राध्यक्ष तालियां बजाते हुए भी नजर आए।

हालांकि सवाल उठ रहे हैं कि क्या ट्रम्प का उद्देश्य सिर्फ गाजा में शांति स्थापित करना है, या उनके इरादे कहीं बड़े हैं? क्या इस बार वह सीधे संयुक्त राष्ट्र को भी चुनौती देंगे? यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल बन गया है।

ट्रम्प की शांति पहल को लेकर दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई है। 60 देशों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन स्वीडन और फ्रांस जैसे अधिकांश देशों ने उनके प्रस्ताव को सीधे खारिज कर दिया। भारत और चीन ने अभी तक अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है। कनाडा को आमंत्रित करने के बाद ट्रम्प ने उसे बाद में वापस ले लिया, जिससे प्रधानमंत्री मार्क कॉर्नी नाराज हुए। इसके बावजूद पश्चिम एशिया के अधिकांश देश ट्रम्प के साथ सहमत होकर बोर्ड ऑफ पीस में शामिल हुए।

दावोस में आयोजित उद्घाटन समारोह में ट्रम्प के साथ 19 देशों के राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी इस अवसर पर शामिल रहे। हालांकि भारत, अमेरिका के मित्र देश फ्रांस और ब्रिटेन के कोई प्रतिनिधि इस उद्घाटन में मौजूद नहीं थे। चीन और रूस सहित अन्य स्थायी सदस्य देशों ने भी प्रतिनिधि नहीं भेजा। रूस ने कहा कि अमेरिका में उनके 1 बिलियन डॉलर को वे फिलिस्तीन को देने के लिए तैयार हैं। फ्रांस ने कार्यक्रम में हिस्सा लेने से मना किया, ब्रिटेन ने फिलहाल अनिश्चितता जताई और चीन ने अभी अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की।

बोर्ड ऑफ पीस का उद्देश्य प्रारंभिक तौर पर गाजा में शांति स्थापित करना है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प का लक्ष्य इससे कहीं बड़ा और गहरा है। ट्रम्प ने साफ किया है कि गाजा से शुरुआत होगी, लेकिन पूरी दुनिया में शांति स्थापना ही उनकी बड़ी योजना है। बोर्ड में 60 देशों को तीन साल के सदस्यता के लिए आमंत्रित किया जाएगा, जबकि 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 9,000 करोड़ रुपये) का योगदान देने पर स्थायी सदस्यता दी जाएगी।

भारत के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निर्णय अभी नहीं लिया गया है। केंद्रीय सरकार के सूत्रों के अनुसार, नयी दिल्ली इस मामले में सतर्क है और अन्य मित्र देशों की स्थिति देख कर ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

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