ढाकाः कूटनीति के जानकार एक स्वर में कह रहे हैं कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन की है-एक ओर भारत, दूसरी ओर पाकिस्तान है। वे स्वयं भी इस बात को भली-भांति जानते हैं। इसलिए चुनाव प्रचार के दौरान ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ नीति की घोषणा करते हुए उन्हें कहते सुना गया-“न दिल्ली, न पिंडी, सबसे पहले बांग्लादेश।”
लेकिन कुर्सी पर बैठने के बाद बांग्लादेश के भावी प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सामने दिल्ली-पाकिस्तान संतुलन बनाए रखते हुए ढाका के लिए ‘समान मर्यादा’ हासिल करने का गणित क्या सचमुच इतना सरल है? कूटनीतिक विश्लेषकों का कहना है-कदापि नहीं। बल्कि भारत-पाकिस्तान के बीच एक अत्यंत जटिल समीकरण में कदम रखने जा रहे हैं खालिदा जिया और जियाउर रहमान के पुत्र।
शुक्रवार सुबह ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक को बधाई संदेश भेजा। उन्होंने लिखा, “यह विशाल जनादेश आपके प्रति बांग्लादेश की जनता के गहरे विश्वास का प्रमाण है। हमारे दोनों देशों के बीच बहुआयामी संबंधों को सुदृढ़ करने और साझा विकास लक्ष्यों की दिशा में आपके साथ काम करने की प्रतीक्षा है।”
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के संदेश में भी ‘साथ मिलकर काम करने’ की बात कही गई। उन्होंने बांग्लादेश और पाकिस्तान के ‘बहुआयामी भ्रातृभावपूर्ण’ संबंधों का उल्लेख किया।
इस परिस्थिति में अनेक कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तारिक के पास एक महत्वपूर्ण लाभ है। वे जनता के मत से निर्वाचित सरकार के नेता हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी सरकार की वैधता और स्वीकार्यता निर्विवाद है। इसलिए उनकी मांग रखने और सौदेबाज़ी की क्षमता भी कई गुना अधिक है। इसी पृष्ठभूमि में आने वाले समय में भारत और पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के संबंध तय होंगे, जो कई कठिन मानकों पर निर्भर हैं और जिनका गणित अत्यंत जटिल है।
हसीना का प्रत्यर्पण
इस समय बांग्लादेश की जनता के एक हिस्से, विशेषकर तारिक के समर्थकों की सबसे बड़ी मांग शेख हसीना वाजेद का प्रत्यर्पण है। इसी कारण प्रचार के दौरान तारिक को कहते सुना गया-“यदि कोई देश किसी तानाशाह को शरण देता है तो उसे बांग्लादेश के आम लोगों के रोष का सामना करना पड़ेगा।” हसीना का प्रत्यर्पण उनकी जीत का एक प्रमुख कारण भी रहा है। अतः कूटनीतिक हलकों का मानना है कि इस मुद्दे पर नई दिल्ली पर दबाव बनाना लगभग अनिवार्य है। तारिक पहले ही संकेत दे चुके हैं। हसीना के विषय में एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा, “संबंधों का सामान्य होना भारत पर भी निर्भर करता है।”
वे जनभावना की अनदेखी नहीं कर सकते। दूसरी ओर भारत भी अब तक कहता आया है कि बांग्लादेश में ‘लोकतांत्रिक और समावेशी’ सरकार होनी चाहिए। वह शर्त अब पूरी हो चुकी है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि तत्काल हसीना को वापस लाना संभव न भी हो तो कम से कम यह सुनिश्चित करने का प्रयास होगा कि वे बांग्लादेश सरकार के विरुद्ध कोई वक्तव्य न दें। इससे दिल्ली-ढाका के बीच खींचतान बढ़ सकती है। शुक्रवार को एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता ने कहा, “कानून के अनुसार बहुत जल्द हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की जाएगी।”
जल समझौता
इस मामले में दिल्ली-ढाका संबंधों में पश्चिम बंगाल की भूमिका प्रमुख हो गई है क्योंकि गंगा और तीस्ता जल बंटवारे के समझौते में राज्य की भागीदारी आवश्यक है। शुक्रवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने भी तारिक को बधाई दी। किंतु क्या जल बंटवारे का प्रश्न सहज रूप से सुलझेगा?
मुख्यतः पश्चिम बंगाल की आपत्तियों के कारण तीस्ता जल बंटवारा समझौता अब तक लागू नहीं हो सका। राज्य का स्पष्ट मत रहा है कि किसानों के हितों से समझौता कर बांग्लादेश को जल नहीं दिया जा सकता। फलस्वरूप तीस्ता का प्रश्न अब भी अनिश्चित बना हुआ है।
गंगा जल समझौते की अवधि इस वर्ष दिसंबर में समाप्त हो रही है। केंद्र की ओर से बताया गया है कि नवीनीकरण पर अभी चर्चा आरंभ नहीं हुई है, यद्यपि पश्चिम बंगाल सहित सभी पक्षों से विचार-विमर्श किया गया है। राज्य के एक सांसद ने कहा है कि द्विपक्षीय संबंधों को ध्यान में रखते हुए समझौते का नवीनीकरण संभव है, किंतु उससे पहले राज्य सरकार से परामर्श अनिवार्य है। पश्चिम बंगाल के हितों की अनदेखी कर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
जंग और सीमा
भारतीय खुफिया एजेंसियों का दावा है कि बांग्लादेश की अस्थिर स्थिति का लाभ उठाकर पिछले कुछ महीनों में वहाँ पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद ने अपने ठिकाने मजबूत किए हैं। इससे पहले अंतरिम सरकार ने राजनीतिक बंदियों की रिहाई के नाम पर कई कुख्यात आतंकियों को जेल से मुक्त कर दिया था। इस पर भारत ने तीव्र आपत्ति जताई।
सीमा पर कंटीले तार की बाड़ लगाने को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद हैं। बांग्लादेश का तर्क है कि 1975 के दिशानिर्देशों के अनुसार सीमा से 150 गज के भीतर कोई सैन्य ढांचा नहीं बनाया जा सकता। वह कंटीले तार की बाड़ को भी उसी श्रेणी में मानता है। भारत का कहना है कि घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए बाड़ आवश्यक है।
विश्लेषकों का मानना है कि तारिक के सत्ता में आने के बाद भी यह तनाव तुरंत समाप्त होगा, ऐसा मानना कठिन है क्योंकि वे पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि वे ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ तथा ‘समान मर्यादा और आत्मसम्मान’ की नीति पर आगे बढ़ेंगे। उनके दल के चुनावी घोषणा-पत्र में भी कहा गया था कि सीमा पर नागरिकों की हत्या या एकतरफा बाड़ निर्माण की स्थिति में कठोर कूटनीतिक रुख अपनाया जाएगा।
और पाकिस्तान
भारत पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान लंबे समय से बांग्लादेश की भूमि का उपयोग करने की कोशिश करता रहा है। अंतरिम सरकार के कार्यकाल में पाकिस्तान के लिए बांग्लादेश के द्वार लगभग पूरी तरह खोल दिए गए कराची-चटगांव मालवाहक जहाज सेवा, पाकिस्तानी वस्तुओं पर शुल्क में भारी छूट, वीजा में रियायत तथा कराची-ढाका उड़ान सेवा शीघ्र शुरू की गई।
इस परिस्थिति में तारिक ‘सार्क’ को सक्रिय करने के उद्देश्य से सत्ता में आए हैं। किंतु भारत-पाकिस्तान विवाद के कारण यह संगठन लंबे समय से स्थगित है। इसे पुनर्जीवित करने के लिए तारिक को दिल्ली और पिंडी के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। उन्होंने पहले एक बड़े आतंकी हमले की कड़ी निंदा की थी और चुनाव प्रचार में भी स्पष्ट कहा था कि धार्मिक उग्रवाद को बढ़ावा देने वाले संगठनों को बांग्लादेश में जड़ जमाने नहीं दिया जाएगा। भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि यदि वे इस रुख पर कायम रहते हैं तो पाकिस्तान के हित प्रभावित होंगे।
समग्र रूप से कूटनीतिज्ञों का मत है कि उनकी पाकिस्तान नीति का लक्ष्य भारत को संतुलित करना हो सकता है और इसका उल्टा भी सत्य है। किंतु समस्या यह है कि दिल्ली और इस्लामाबाद ऐसी दो नावें हैं जिन पर एक साथ पैर रखकर चलना अंततः गिरावट का कारण बन सकता है। पूर्ववर्ती शासन एक मार्ग दिखाकर गया है, किंतु वह भारत-विरोध की तीव्रता से भरा हुआ था। उस मार्ग पर वे कितनी दूर तक जाएंगे, इसी पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। इसका सीधा प्रभाव उपमहाद्वीप की कूटनीतिक संरचना पर पड़ेगा।