ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में कई आतंकी ठिकानों को तबाह कर दिया गया। अंतरराष्ट्रीय मीडिया सूत्रों के मुताबिक, ये ठिकाने धीरे-धीरे पाकिस्तान सरकार की मदद से बनाए जा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की जवाबी कार्रवाई में दो सौ से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं। जैश-ए-मोहम्मद ने मारे गए आतंकियों के परिवारों की पत्नियों और महिलाओं के साथ मिलकर 'वुमन ब्रिगेड' बनाने का काम शुरू कर दिया है। संगठन का नाम जमात-उल-मोमिनत (जमात-उल-मोमिनत) है। मसूद अजहर की बहन सादिया अजहर इस काम की कमान संभाल रही हैं। जैश ही नहीं, लश्कर-ए-तैयबा (लश्कर-ए-तैयबा) भी है।
सूत्रों के मुताबिक, ये आतंकवादी समूह अब महिलाओं को आत्मघाती हमला (Suicide Bomber) की ट्रेनिंग देंगे और उन्हें विभिन्न स्थानों पर तैनात करेंगे। उन्हें आईएस, बोको हराम, हमास (Hamas) और एलटीटीई जैसे आतंकवादी समूहों में भर्ती किया जाएगा। प्रशिक्षण प्राप्त महिलाओं को ही कार्य करना होगा। ये आतंकवादी संगठन पहले से ही हमलों के लिए महिलाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। खुफिया रिपोर्टों में पता चला है कि जैश के नेतृत्व का अनुसरण करते हुए लश्कर एक इस्लामी शिक्षा संस्थान के पीछे अपने महिला ब्रिगेड का विस्तार कर रहा है।
आतंकवादी समूह महिलाओं को किस तरह लुभा रहे हैं ?
जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) ब्रिगेड महिलाओं को धर्म के नाम पर लालच देती है और उन्हें आतंकवादी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। मसूद का आतंकी संगठन मक्का और मदीना की तस्वीरों का इस्तेमाल कर शहरी महिलाओं के बीच धार्मिक भावनाएं पैदा करने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में इस संगठन की ओर से लाहौर में एक सभा आयोजित की गई थी। यह मुस्लिम विरोधी बयानबाजी की बात करता है और जिहाद के महत्व को समझाता है। मुख्य वक्ता तैयब्बत के इफत सईद थे। सूत्रों के मुताबिक, लश्कर कमांडर की पत्नियां भी इस सभा में शामिल हुईं। संयुक्त राष्ट्र इस बात पर भी नजर रख रहा है कि 'जमात-उल-मोमिनत' के जरिए महिलाओं का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है।
महिलाओं का यह संगठन कैसे काम करता है ?
जानकारी मिली है कि महिला कैडरों का काम लॉजिस्टिक सपोर्ट देना, समाज में संपर्क बनाए रखना और नए लोगों को समूह में शामिल करना है। अब तक ये काम पुरुष जंगली करने वाले संगठन लश्कर और जैश ही करते थे। लेकिन महिलाओं को शामिल करके ये प्रतिबंधित जंगली संगठन अपनी रणनीति में बदलाव कर रहे हैं। इसे भारत सहित कई राज्यों के लिए चिंता का विषय मानते हैं अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ।