ढाकाः बांग्लादेश की राजनीति में पिछले 35 वर्षों से एक ही कहानी दोहराई जाती रही है- ‘बेगमों का संघर्ष’। 1990 से देश की सत्ता दो प्रभावशाली महिला नेताओं के हाथों में रही। यह संघर्ष केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा नहीं था, बल्कि सत्ता, विचारधारा और जनसमर्थन की लंबी राजनीतिक लड़ाई थी।
12 फरवरी 2026 को तेरहवें राष्ट्रीय संसदीय चुनाव के दौरान घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने इस लंबे अध्याय को लगभग विराम दे दिया। बंगबंधु की बेटी शेख हसीना चुनावी प्रक्रिया के बीच देश छोड़कर चली गईं, जबकि खालिदा जिया का पहले ही निधन हो चुका है। इन परिस्थितियों ने बांग्लादेश की राजनीति में एक नया अध्याय लिखने की जमीन तैयार कर दी है।
BNP को दो-तिहाई बहुमत
राजनीतिक हलकों में चल रहे निजी अनुमानों के अनुसार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने लगभग दो-तिहाई सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। यदि ये आंकड़े अंतिम परिणामों में भी कायम रहते हैं, तो यह जीत ऐतिहासिक मानी जाएगी।
इसका सीधा अर्थ यह है कि खालिदा जिया के बेटे और BNP के चेयरमैन तारिक रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री पद की कुर्सी संभालने जा रहे हैं। लगभग साढ़े तीन दशक बाद देश की बागडोर किसी पुरुष नेता के हाथ में जाएगी। यह बदलाव प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 35 वर्षों तक महिला नेतृत्व ही देश की राजनीति का केंद्र रहा।
दो सीटों से लड़े, दोनों सीटों से जीते
तारिक रहमान ने इस चुनाव में दो सीटों-ढाका-17 और बोगरा-6 से चुनाव लड़ा। यह रणनीति उनके आत्मविश्वास और संगठनात्मक मजबूती का संकेत मानी जा रही है। खास बात यह रही कि उनकी मां खालिदा जिया लंबे समय से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ती रही थीं।
चुनावी परिणामों के अनुसार, तारिक रहमान दोनों सीटों से विजयी रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत उनके व्यक्तिगत प्रभाव और पार्टी नेतृत्व दोनों की पुष्टि करती है। इसे उनकी ‘पर्सनल लड़ाई’ और ‘पार्टी कैप्टनशिप’-दोनों में सफलता के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक हलकों का दावा है कि इस दोहरी जीत ने उनके ‘पॉलिटिकल CV’ को और अधिक मजबूत बना दिया है।
1988 के बाद से पुरुष प्रधानमंत्री नहीं
वरिष्ठ नेताओं के मुताबिक, बांग्लादेश के आखिरी पुरुष प्रधानमंत्री काजी जफर अहमद थे, जो 1988 में इरशाद के शासनकाल में प्रधानमंत्री बने और 1990 में सत्ता छोड़ दी। इसके बाद से देश की कमान लगातार खालिदा जिया और शेख हसीना के हाथों में रही।
करीब 35 वर्षों तक सत्ता की यह अदला-बदली इन्हीं दो नेताओं के बीच सीमित रही, जिसने बांग्लादेश की राजनीति को एक विशिष्ट पहचान दी।
बेगमों के दौर पर लगा विराम
दोनों नेताओं की राजनीति में एंट्री पूर्वनियोजित नहीं थी, बल्कि परिस्थितियों की देन थी। 1975 में शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार की हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने देश को झकझोर दिया और उनकी बेटी शेख हसीना को सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।
दूसरी ओर, 1981 में तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या के बाद खालिदा जिया राजनीति में आईं। इन दो बड़ी घटनाओं ने दोनों बेगमों को राजनीति के मैदान में उतार दिया। इसके बाद दशकों तक चली उनकी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने देश की दिशा और दशा तय की।
दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी पार्टियों को मजबूती से खड़ा किया, जनसमर्थन जुटाया और लंबे समय तक सत्ता संभाली। अब 35 वर्षों बाद बांग्लादेश में बदलाव का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है, जो देश की राजनीतिक धारा को नई दिशा दे सकता है।