नई दिल्ली : देश में छोटे कारोबारियों और स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने 11 साल पूरे कर लिए हैं। इस योजना की शुरुआत 8 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। इसका उद्देश्य उन लोगों तक आसान ऋण पहुंचाना है जिन्हें पहले बैंकिंग प्रणाली से कर्ज नहीं मिल पाता था।
सरकार के अनुसार, इस योजना के तहत अब तक 57.79 करोड़ से अधिक ऋण दिए जा चुके हैं जिनकी कुल राशि 40 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। यह योजना खासतौर पर छोटे व्यापार, गैर-कॉरपोरेट और गैर-कृषि गतिविधियों के लिए शुरू की गई थी जिसमें बिना गारंटी के 20 लाख रुपये तक का ऋण मिलता है।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम यानी एमएसएमई को देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। ये न केवल बड़े उद्योगों को सहयोग देते हैं बल्कि रोजगार सृजन और संतुलित विकास में भी अहम भूमिका निभाते हैं। मुद्रा योजना के जरिए इन उद्यमों को आर्थिक सहायता मिल रही है जिससे वे अपने कारोबार को बढ़ा रहे हैं और नए क्षेत्रों में कदम रख रहे हैं।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि पिछले एक दशक में देश में उद्यमिता के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है। करोड़ों लोगों ने आत्मविश्वास के साथ अपना व्यवसाय शुरू किया है। उन्होंने बताया कि इस योजना के तहत करीब दो-तिहाई ऋण महिलाओं को दिए गए हैं जबकि लगभग 20 प्रतिशत ऋण पहली बार कारोबार शुरू करने वालों को मिले हैं।
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा कि यह योजना छोटे उद्यमियों के लिए एक मजबूत सहारा बनी है। इससे समाज के कमजोर वर्गों जैसे अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को भी बड़ा लाभ मिला है। करीब 51 प्रतिशत लाभार्थी ओबीसी वर्ग से और 67 प्रतिशत महिलाएं हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि मुद्रा योजना ने छोटे कारोबारियों को साहूकारों के चंगुल से बाहर निकालकर उन्हें औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा है। इससे देशभर में स्वरोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं।
सरकार का मानना है कि आने वाले समय में यह योजना देश को 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।