नई दिल्लीः वैश्विक केंद्रीय बैंक 2026 में भी सोने को रिजर्व एसेट के रूप में खरीदना जारी रख सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों की तुलना में खरीदारी की रफ्तार धीमी हो सकती है। YES बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, यह बदलाव भू-राजनीतिक जोखिमों में कमी, मौद्रिक नीति में बदलाव और अमेरिकी डॉलर के रुझानों में संभावित उतार-चढ़ाव के कारण हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ सालों में वैश्विक अनिश्चितता और डॉलर के खिलाफ बढ़ते दांव ने केंद्रीय बैंकों की गोल्ड खरीदी को तेज कर दिया था। हालांकि, जैसे-जैसे जोखिम प्रीमियम कम होंगे और वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिर होगी, केंद्रीय बैंक अब इतनी तेजी से गोल्ड जमा नहीं करेंगे।
डॉलर और अमेरिकी मौद्रिक नीति का असर
US फेडरल रिजर्व ने सितंबर 2025 में रेट-कटिंग चक्र फिर से शुरू किया, जिसने गोल्ड की कीमतों को समर्थन दिया। अमेरिका में कमजोर लेबर मार्केट डेटा और नरम मुद्रास्फीति ने भी इस रुझान को मजबूत किया।
रिपोर्ट के अनुसार, आगे भी रेट कट डॉलर को कमजोर कर सकता है, जिससे गोल्ड को अल्पकालिक सहारा मिलेगा। हालांकि 2026 के दूसरे हिस्से में डॉलर मजबूत होने की संभावना भी है। खासकर अमेरिका और यूरोप जैसी अन्य अर्थव्यवस्थाओं के विकास अंतर के कारण। डॉलर मजबूत होने पर सोने की कीमतों और केंद्रीय बैंक मांग पर दबाव पड़ सकता है।
सोने की कीमत और तकनीकी अनुमान
YES बैंक के तकनीकी विश्लेषण के अनुसार: यदि गोल्ड USD 4,400 प्रति औंस के स्तर पर बना रहता है, तो कीमत USD 4,500-4,550 प्रति औंस तक बढ़ सकती है। अगर कीमत USD 4,200 से नीचे गिरती है तो बुलिश ट्रेंड कमजोर हो सकता है। इससे स्पष्ट है कि गोल्ड अभी भी रणनीतिक निवेश और रिजर्व एसेट के रूप में महत्व रखता है, लेकिन मूल्य और मांग पर डॉलर के उतार-चढ़ाव का असर होगा।
चांदी का बढ़ता आकर्षण
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चांदी (Silver) सोने की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर रही है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं: औद्योगिक मांग में बढ़ोतरी जैसे कि नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, डेटा सेंटर और रक्षा क्षेत्र।सप्लाई की कमी, जो चांदी की कीमत को और मजबूती देती है। इसलिए निवेशक अब सोने के साथ-साथ चांदी में भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
गोल्ड की भूमिका बनी रहेगी महत्वपूर्ण
कुल मिलाकर, गोल्ड वैश्विक केंद्रीय बैंकों के लिए रणनीतिक रिजर्व एसेट के रूप में अहमियत बनाए रखेगा। हालांकि 2026 में अत्यधिक खरीदारी की तेजी कम होकर, संतुलित और मापी हुई रफ्तार में बदल सकती है। डॉलर के उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक स्थिरता इस रुझान को प्रभावित करेंगे।