कोलकाताः जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय दबाव और आजीविका की चुनौतियों से जूझ रहे सुंदरबन क्षेत्र में संस्कृति और परंपरा को विकास का आधार बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली। यूनेस्को और पश्चिम बंगाल सरकार के सहयोग से 20 और 21 दिसंबर 2025 को सुंदरबन के साजनखाली में आयोजित ‘सुंदररिदम फेस्टिवल 2025’ ने यह संदेश दिया कि विरासत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की जीवनरेखा भी है।
इस महोत्सव का आयोजन कोलकाता सोसाइटी फॉर कल्चरल हेरिटेज (KSCH) द्वारा किया गया, जो यूनेस्को के रूरल क्राफ्ट एंड कल्चरल हब्स (RCCH) प्रोजेक्ट की कार्यान्वयन एजेंसी है। उत्सव में राज्यभर से आए 100 से अधिक कारीगरों, लोक कलाकारों, शिक्षकों और समुदाय प्रतिनिधियों ने भाग लिया और बंगाल की समृद्ध जीवित सांस्कृतिक विरासत को मंच प्रदान किया।
महोत्सव के दौरान छाऊ, झूमुर, बाउल-फकीरी, भटियाली, रायबेंशे, गम्भीरा और भवाईया जैसी लोक परंपराओं की प्रस्तुतियां हुईं। ये प्रदर्शन सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सांस्कृतिक अधिकार, पहचान और पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान हस्तांतरण जैसे अहम विषयों पर संवाद का माध्यम बने।
सुंदरबन बायोस्फियर रिजर्व की पृष्ठभूमि में आयोजित इस आयोजन ने संस्कृति, प्रकृति और समुदाय की आपसी निर्भरता को रेखांकित किया। वर्ष 1997 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल सुंदरबन आज जलवायु परिवर्तन, चक्रवात, खारे पानी के बढ़ते प्रभाव और मानवीय दबाव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में यहां की सांस्कृतिक परंपराएं और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां समुदायों को प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की सीख देती हैं। यह स्पष्ट करता है कि विरासत का संरक्षण कोई स्थिर प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक जीवंत और निरंतर चलने वाली सामुदायिक जिम्मेदारी है।
महोत्सव के तहत आयोजित हस्तशिल्प और हथकरघा प्रदर्शनी ने ग्रामीण कारीगरों को बाजार से जोड़ने का अवसर दिया और यह दिखाया कि संस्कृति समावेशी स्थानीय विकास की मजबूत धुरी बन सकती है। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा बनबीबी पाला, जो सुंदरबन की पारंपरिक संगीत-नाट्य शैली है और मानव, प्रकृति व आस्था के बीच संतुलन का संदेश देती है।
विश्लेषकों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में हजारों कारीगर और सांस्कृतिक कलाकार अपनी आजीविका के लिए पारंपरिक ज्ञान पर निर्भर हैं, लेकिन घटती आय, सीमित बाजार और संस्थागत समर्थन की कमी उनके सामने बड़ी चुनौतियां हैं। RCCH पहल इन समस्याओं का समाधान संस्कृति को एक उत्पादक आर्थिक संसाधन के रूप में स्थापित कर खोजती है, जिससे रोजगार सृजन, सूक्ष्म उद्यमों को बढ़ावा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सके।
यूनेस्को की ‘आर्ट फॉर लाइफ’ अप्रोच पर आधारित यह परियोजना समुदायों को निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में रखती है और कलाकारों-कारीगरों को केवल परंपरा के वाहक नहीं, बल्कि सतत विकास के सक्रिय साझेदार के रूप में मान्यता देती है।
यूनेस्को पश्चिम बंगाल सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम एवं वस्त्र विभाग (MSME&T) के सहयोग से रूरल क्राफ्ट एंड कल्चरल हब्स (RCCH) परियोजना को लागू कर रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य समुदाय आधारित आजीविका को सशक्त बनाना और राज्य की जीवित सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और संवर्धन करना है। यह पहल हस्तशिल्प, हथकरघा, प्राकृतिक रेशों पर आधारित कारीगरी, प्रदर्शन कला और लोक परंपराओं पर केंद्रित है। यह परियोजना 20 जिलों और 35 अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (ICH) तत्वों में फैली हुई है और इसका लक्ष्य पश्चिम बंगाल में 50,000 से अधिक कारीगरों और कलाकारों की आजीविका को बढ़ाना और स्थायी बनाना है।
‘सुंदररिदम फेस्टिवल 2025’ के माध्यम से यूनेस्को और उसके साझेदारों ने 2003 के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत संरक्षण कन्वेंशन और 2005 के सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की विविधता कन्वेंशन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। यह आयोजन इस बात का उदाहरण बना कि जब संस्कृति, आजीविका और पर्यावरण एक साथ जुड़ते हैं, तो विकास न केवल टिकाऊ होता है, बल्कि समुदायों की पहचान और आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करता है।