नई दिल्लीः देश के चावल निर्यातक चाहते हैं कि केंद्रीय बजट 2026 में उन्हें कुछ राहत दी जाए, ताकि उनकी लागत कम हो। इसके साथ ही वे दुनिया के बाजार में बेहतर तरीके से मुकाबला कर सकें। इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन का कहना है कि अगर सरकार निर्यात ऋण पर ब्याज में छूट, माल ढुलाई में मदद और कर राहत दे तो इससे निर्यातकों को फायदा होगा। चावल का उत्पादन भी ज्यादा टिकाऊ बन सकेगा।
भारत दुनिया के चावल व्यापार में करीब 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। साल 2024-25 में भारत ने 170 से ज्यादा देशों को 20 मिलियन टन से अधिक चावल निर्यात किया। निर्यातकों का कहना है कि चावल का निर्यात किसानों की आमदनी, गांवों में रोजगार और देश को मिलने वाली विदेशी मुद्रा के लिए बहुत अहम है। हालांकि, इस क्षेत्र को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। प्रमुख धान उत्पादक इलाकों में भूजल तेजी से घट रहा है, खरीद और भंडारण की लागत बढ़ रही है और बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रहता है।
इसी वजह से फेडरेशन ने सरकार से निर्यात के लिए लिए जाने वाले कर्ज पर चार प्रतिशत ब्याज छूट देने की मांग की है। इसके अलावा सड़क और रेल से माल भेजने पर तीन प्रतिशत तक खर्च की भरपाई करने और निर्यात पर लगने वाले करों की वापसी योजना के तहत समय पर भुगतान की मांग की है। साथ ही, ऐसे किसानों और राइस मिलों को कर में छूट देने का सुझाव भी दिया गया है, जो पानी की बचत और कम प्रदूषण वाली तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।
चावल निर्यातकों की मांगें सिर्फ तात्कालिक मदद तक सीमित नहीं हैं। वे चाहते हैं कि सरकार ऐसी नीतियां बनाए जिससे उत्पादन का तरीका सुधरे। निर्यातकों का कहना है कि बेहतर गुणवत्ता वाला चावल उगाया जाए जिससे पर्यावरण को भी नुकसान न पहुंचे। अगर बजट में इन सुझावों पर ध्यान दिया जाता है तो इससे चावल निर्यात मजबूत होगा। इसके साथ ही किसानों की आय के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिल सकता है।