नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने 27,000 करोड़ रुपये के बहुचर्चित बैंक धोखाधड़ी और धन शोधन मामले में अमटेक समूह के पूर्व चेयरपर्सन अरविंद धाम को जमानत दे दी है। अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें गंभीर आर्थिक अपराध का हवाला देते हुए जमानत से इनकार किया गया था। यह फैसला एक बार फिर इस बहस को सामने लाता है कि बड़े आर्थिक अपराधों में जमानत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे तय किया जाए।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले अपने आदेश में कहा था कि धन शोधन जैसे आर्थिक अपराध देश की वित्तीय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा हैं। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, मामलों में जल्दबाजी में जमानत देना जांच, मुकदमे और सार्वजनिक विश्वास को नुकसान पहुंचा सकता है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया था कि इस तरह के मामलों में जटिल लेनदेन, कई कंपनियों की परतें और लंबी सुनवाई शामिल होती है। इससे निरंतर हिरासत आवश्यक हो जाती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने धाम की अपील स्वीकार करते हुए जमानत मंजूर कर दी। इससे यह संकेत मिलता है कि शीर्ष अदालत आर्थिक अपराधों में भी प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर राहत देने के पक्ष में है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रवर्तन निदेशालय ने अमटेक समूह और उससे जुड़ी कंपनियों की 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियां कुर्क की हैं और जांच अभी जारी है।
प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार, अमटेक समूह की कंपनियों ने कथित रूप से खातों में हेराफेरी कर फर्जी संपत्तियां दिखाईं हैं। इसके साथ ही अतिरिक्त कर्ज लिया और बाद में कंपनियों को दिवालिया घोषित कर बैंकों को 80 प्रतिशत से अधिक का नुकसान पहुंचाया। जांच एजेंसी का दावा है कि इससे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को भारी वित्तीय क्षति हुई और जमाकर्ताओं का भरोसा कमजोर हुआ।
विश्लेषण के तौर पर देखें तो सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश यह स्पष्ट करता है कि आर्थिक अपराध गंभीर होने के बावजूद जमानत को पूरी तरह असाधारण नहीं माना जा सकता। साथ ही, यह फैसला जांच एजेंसियों पर यह जिम्मेदारी भी डालता है कि वे समयबद्ध और ठोस साक्ष्यों के साथ मामलों को आगे बढ़ाएं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि लंबी सुनवाई और बड़े आर्थिक घोटालों के मामलों में न्यायिक संतुलन किस दिशा में जाता है।