भारतीय समाज में स्त्री को अर्धांगिनी कहा जाता है। अर्थात् समाज-परिवार का आधा हिस्सा पति होते हैं और आधा हिस्सा स्त्री होती हैं। पति और पत्नी की संयुक्त कोशिशों से ही परिवार सुखमय होता है। परिवार में सुख, शांति और आर्थिक स्थिति पति और पत्नी दोनों पर ही निर्भर करती है। कहा जाता है, पति और पत्नी को कभी भी एक-दूसरे से कुछ छुपाना नहीं चाहिए।
श्रीकृष्ण ने कहा, कुछ ऐसे काम हैं, जिन्हें करने से पहले पति को अपनी पत्नी की अनुमति जरूर लेनी चाहिए। पत्नी को बताए बिना यह काम करने पर स्वयं माँ लक्ष्मी क्रोधित हो जाती हैं और वह संसार छोड़कर चली जाती हैं। जानिए कौन सा काम हमेशा पत्नी को बताकर करना चाहिए।
दान करने से पहले पत्नी की अनुमति लें
दान करना एक विशेष पुण्य का काम है लेकिन पति धर्म के अनुसार दान करने से पहले पत्नी की अनुमति लेना अनिवार्य है। क्योंकि पति की संपत्ति और भोजन पर पत्नी का समान अधिकार है। इसलिए गृहलक्ष्मी की अनुमति के बिना दान करने पर देवी क्रोधित हो जाती हैं। इस विषय में द्वापर युग की एक आकर्षक कहानी भी है।
कृष्ण और सुदामा की कहानी
द्वापर युग के कृष्ण और सुदामा की मित्रता को इस कलियुग में भी आदर्श के रूप में देखा जाता है। जब सुदामा अपार गरीबी के साथ लड़ रहे थे, तब पत्नी के बार-बार अनुरोध पर वे द्वारका जाकर कृष्ण से मिलने जाते हैं। अपने बचपन के मित्र का स्वागत करने के लिए कृष्ण नंगे पांव दौड़कर आते हैं। राजसी भव्यता और तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन के साथ सुदामा का सत्कार करते हैं द्वारका के अधिपति कृष्ण। मित्र के साथ बातें करते हुए कृष्ण पूछते हैं कि सुदामा की पत्नी उनके लिए क्या उपहार भेजी है। गरीब सुदामा बहुत संकोच के साथ एक छोटी सी गठरी में चावल निकालते हैं लेकिन कृष्ण उसे अत्यंत उत्सुकता के साथ ग्रहण करते हैं।
कृष्ण को रुक्मिणी रोकती हैं
सुदामा जो कृष्ण के पास मदद के लिए आए थे, यह समझकर कृष्ण सुदामा की पत्नी द्वारा भेजा गया चावल का बना हुआ भोजन खाने लगते हैं। जैसे ही वे पहला कौर मुँह में डालते हैं, स्वर्ग का सम्पदा सुदामा के हिस्से में आ जाती है। दूसरा कौर मुँह में डालते ही पृथ्वी का सारा सम्पदा सुदामा के अधिकार में आ जाता है। जब कृष्ण तीसरा कौर मुँह में डालने जाते हैं, तब उनका हाथ रुक्मिणी रोक लेती हैं। मुस्कुराते हुए वह कहती हैं, 'स्वामी, अगर आप तीसरा कौर मुँह में डालकर वैकुंठ भी दे दें, तो हम कहाँ रहेंगे ? भक्त को दान देना निस्संदेह महान कार्य है लेकिन संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है।' श्रीकृष्ण तब रुक्मिणी की बात समझते हैं और कहते हैं कि अब से यह नियम लागू होगा कि पत्नी की अनुमति और सलाह लेकर ही दान करना होगा।