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रोजवैली में फॉरेंसिक ऑडिट पर रोक की कोशिश नाकाम, ED को सुप्रीम कोर्ट से झटका

फॉरेंसिक ऑडिट को अवैध घोषित कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी ED

By अमित चक्रवर्ती, Posted by: श्वेता सिंह

Jan 13, 2026 15:40 IST

कोलकाताः अवैध चिटफंड कंपनी रोजवैली की जब्त संपत्तियों में कथित वित्तीय गड़बड़ी को लेकर कोलकाता हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फॉरेंसिक ऑडिट के आदेश पर रोक लगाने की कोशिश में प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सुप्रीम कोर्ट में बड़ा झटका लगा है। रोजवैली की जब्त संपत्तियों की बिक्री कर निवेशकों को पैसा लौटाने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश दिलीप सेठ की अध्यक्षता में गठित कमेटी पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे हैं। साथ ही, रोजवैली की 20 से 30 हजार करोड़ रुपये की जब्त संपत्तियों में गड़बड़ी के आरोपों को देखते हुए कोलकाता हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया था।

ED ने फॉरेंसिक ऑडिट को अवैध घोषित करने और इससे जुड़े कुछ अन्य अनुरोधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) दायर की थी। सोमवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि ED की याचिका बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं है।

कोर्ट की आपत्ति के बाद ED की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान मौजूद जमाकर्ताओं के वकील शुभाशीष चक्रवर्ती और शंखदीप चक्रवर्ती ने उम्मीद जताई कि अब हाईकोर्ट के निर्देश पर होने वाले फॉरेंसिक ऑडिट में कोई अड़चन नहीं रहेगी।

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच की अध्यक्षता न्यायमूर्ति राजर्षि भारद्वाज कर रहे हैं। उन्होंने शुरुआत से ही संपत्तियों के रखरखाव और कमेटी की भूमिका पर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने सीएजी, राज्य वित्त विभाग, केंद्रीय वित्त मंत्रालय और सेबी जैसी कई संस्थाओं को ऑडिट की जिम्मेदारी देने की कोशिश की, लेकिन सभी ने किसी न किसी वजह से इससे किनारा कर लिया।

हाल ही में केंद्र सरकार के कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के अधीन सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) ने हाईकोर्ट के निर्देश पर फॉरेंसिक ऑडिट के लिए सहमति जताई। SFIO पहले पूरे मामले की प्रारंभिक जांच करेगा और अगर गड़बड़ी के संकेत मिले तो विस्तृत जांच आगे बढ़ाई जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में ED ने यह भी मांग की थी कि जमाकर्ताओं की ओर से उठाए जा रहे सवालों की जांच के लिए राज्य की वेबेल एजेंसी की बजाय किसी अन्य राज्य की AI-आधारित एजेंसी को नियुक्त किया जाए। हाईकोर्ट ने इस पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि इसके लिए आने वाला भारी खर्च कौन वहन करेगा। ED इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई, जिसके बाद हाईकोर्ट ने सुनवाई टाल दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मांग को खारिज कर दिया है।

हालांकि हाईकोर्ट रोजवैली की संपत्तियों और कमेटी की भूमिका पर लगातार सवाल उठा रहा है, लेकिन ED की अत्यधिक सक्रियता को लेकर भी विभिन्न हलकों में सवाल उठ रहे हैं। रोजवैली मामले से जुड़े वकीलों का कहना है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश दिलीप सेठ की अध्यक्षता वाली कमेटी में खुद ED और राज्य की आर्थिक अपराध शाखा का एक अधिकारी शामिल है। ऐसे में कमेटी के कामकाज से ED अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकती। इसी कारण फॉरेंसिक ऑडिट से बचने की ED की कोशिशों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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