कोलकाताः पश्चिम बंगाल में 100 दिन के काम यानी मनरेगा योजना अब केवल मजदूरी का सवाल नहीं बल्कि सियासी टकराव का बड़ा मुद्दा बन गई है। तृणमूल कांग्रेस इसे 'केंद्र की अनदेखी' कर लोगों को 'वंचित' रखने की नीति बताकर विधानसभा चुनाव में ग्रामीण वोटरों को साधने का हथियार बना रही है। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने पलटवार करते हुए 25 लाख 'फर्जी जॉब कार्ड' का दावा किया है। इसी को मुद्दा बना कर तृणमूल पर हमला करने का माध्यम बना दिया है। मंगलवार सुबह सॉल्टलेक स्थित भाजपा कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए राज्य भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने कहा कि बंगाल में अब तक 25 लाख फर्जी जॉब कार्ड सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, यह संख्या बढ़ सकती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मनरेगा में भ्रष्टाचार के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और गबन की राशि की वसूली के बिना फंड जारी नहीं किया जा सकता। इसका मकसद मजदूरों को उनके हक से वंचित करना नहीं बल्कि असली लाभार्थियों तक पैसा पहुंचाना है।
तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के 25 लाख फर्जी जॉब कार्ड के दावे पर सवाल उठाया है। पार्टी प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि केंद्र सरकार ने संसद में लिखित जवाब में बताया है कि बंगाल में केवल 5,162 मामलों में ही आधार और जॉब कार्ड का मिलान नहीं हुआ। उन्होंने पूछा कि फिर भाजपा यह विशाल आंकड़ा कहां से ला रही है। इसके साथ ही तृणमूल ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहां मनरेगा में कहीं ज्यादा अनियमितताएं सामने आई हैं। फिर भी वहां फंड नहीं रोका गया और कार्रवाई भी सीमित रही। बंगाल को केवल इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि यहां की जनता ने भाजपा को राजनीतिक रूप से नकार दिया।
इस बीच इस विवाद का सबसे बड़ा असर ग्रामीण मजदूरों पर पड़ रहा है। महीनों से रुकी मजदूरी ने हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित की है। इस वजह से गांवों में असमंजस की स्थिति है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द कोई व्यावहारिक समाधान नहीं निकला तो यह मुद्दा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
मनरेगा अब केवल रोजगार योजना नहीं रह गई है बल्कि बंगाल की ग्रामीण राजनीति का प्रमुख हथियार बन चुकी है। तृणमूल इसे भावनात्मक और सामाजिक न्याय का मुद्दा बनाकर चुनावी फायदा उठाना चाहती है। वहीं भाजपा भ्रष्टाचार और फर्जी जॉब कार्ड के मुद्दे के जरिए सरकार की क्लीन इमेज पर सवाल उठा रही है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि केंद्र और राज्य के बीच कोई समाधान निकलता है या मनरेगा 2026 की चुनावी लड़ाई में स्थायी हथियार बनकर रह जाता है।