कोलकाताः उत्तर बंगाल के चाय बागान क्षेत्रों में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चिंता गहराती जा रही है। बड़ी संख्या में चाय बागान मजदूरों को नोटिस मिलने के बाद यह आशंका पैदा हो गई है कि अंतिम मतदाता सूची से उनके नाम हटाए जा सकते हैं। इसी मुद्दे को लेकर पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल को पत्र लिखकर चाय बागान मजदूरों के पक्ष में हस्तक्षेप की मांग की है।
कोलकाता में मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन में शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि दार्जिलिंग, तराई और डुआर्स सहित उत्तर बंगाल के विभिन्न इलाकों में चाय बागान मजदूर पीढ़ियों से रह रहे हैं। इसके बाद भी उनके पास अक्सर स्कूल सर्टिफिकेट या अन्य औपचारिक दस्तावेज नहीं होते। उन्होंने चुनाव आयोग से अनुरोध किया है कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत उपलब्ध दस्तावेजों को मान्य किया जाए, ताकि किसी भी चाय मजदूर का नाम मतदाता सूची से न हटे। उनका कहना था कि SIR प्रक्रिया के दौरान सबसे पहले दार्जिलिंग के भाजपा सांसद राजू बिष्ट ने इस विषय को मुख्य निर्वाचन अधिकारी के सामने उठाया था और भाजपा का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी चाय बागान मजदूर का मतदान अधिकार छीना न जाए।
शुभेंदु अधिकारी ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार को भी घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में केवल पश्चिम बंगाल सरकार ही वन अधिकार अधिनियम, 2006 को सही ढंग से लागू नहीं करती। उनका दावा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अवैध रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची में बनाए रखने के लिए तीन बार चुनाव आयोग को पत्र लिखा। उन्होंने चाय बागान मजदूरों के समर्थन में एक बार भी आयोग से संपर्क नहीं किया। शुभेंदु ने कहा कि इसकी वजह यह है कि उत्तर बंगाल के चाय मजदूरों का समर्थन तृणमूल कांग्रेस को नहीं मिलता।
भाजपा के इन आरोपों पर तृणमूल कांग्रेस ने पलटवार किया है। पार्टी के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि ममता बनर्जी सरकार ने “चाय सुंदरी” परियोजना सहित कई योजनाओं के माध्यम से चाय बागान मजदूरों के जीवन और आजीविका को सुरक्षित किया है। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंद चाय बागान खोलने का वादा किया था। सत्ता में आने के बाद इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई। अरूप चक्रवर्ती का आरोप है कि केंद्र की नीतियों के कारण चाय बागान मजदूर आज भी अनिश्चितता और संकट में जीने को मजबूर हैं।
मतदाता सूची से नाम कटने की आशंका और राजनीतिक बयानबाजी के बीच उत्तर बंगाल के चाय बागान इलाकों में बेचैनी बढ़ती जा रही है। चाय बागान मजदूर राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मतदाता वर्ग माने जाते हैं। ऐसे में यह मुद्दा आने वाले दिनों में बंगाल की सियासत में और अधिक तूल पकड़ सकता है।