कोलकाताः पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर टकराव का माहौल बन गया है। तृणमूल कांग्रेस ने अपने दो प्रमुख सांसदों-अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर कथित हमलों को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। इसी कड़ी में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने कोलकाता के रानी रासमनी एवेन्यू में धरना दिया।
ममता बनर्जी ने प्रदर्शन से पहले डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और संविधान की प्रति हाथ में लेकर विरोध दर्ज कराया। टीएमसी का संदेश साफ था कि वह इन घटनाओं को केवल राजनीतिक हिंसा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और विपक्ष की आवाज को दबाने की कोशिश के रूप में पेश करना चाहती है।
दिलीप घोष ने क्यों कहा- जनता साथ नहीं है ?
टीएमसी के प्रदर्शन के जवाब में राज्य के मंत्री दिलीप घोष ने दावा किया कि इस आंदोलन को जनता का समर्थन नहीं मिला। उनका कहना था कि जनता अपना जनादेश दे चुकी है और अब ऐसे प्रदर्शनों में लोगों की रुचि नहीं दिख रही है।
दिलीप घोष का यह बयान सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। भाजपा यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि चुनाव के बाद भी टीएमसी जनता के मुद्दों के बजाय राजनीतिक सहानुभूति जुटाने की रणनीति पर काम कर रही है। यही कारण है कि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को जनभावनाओं से कटे हुए आंदोलन के रूप में पेश कर रही है।
हमलों के आरोपों ने क्यों बढ़ाया राजनीतिक तापमान ?
सांसद अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया है कि दक्षिण 24 परगना के दौरे के दौरान उन पर ईंट, पत्थर और अंडों से हमला किया गया, जिससे उनकी आंख में चोट लगी। वहीं कल्याण बनर्जी ने भी दावा किया कि चंडीतला क्षेत्र में ज्ञापन सौंपने के दौरान उन्हें निशाना बनाया गया।
इन आरोपों के बाद टीएमसी ने राजनीतिक प्रताड़ना का मुद्दा उठाया, जबकि प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी। पुलिस अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। हालांकि विपक्ष और सत्तापक्ष के आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह मामला केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का हिस्सा बन गया है।
आगे क्या ? बंगाल की राजनीति पर कितना असर पड़ेगा ?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले महीनों में बंगाल की राजनीति को और गर्म कर सकता है। टीएमसी इस मुद्दे के जरिए अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एकजुट रखने की कोशिश करेगी, जबकि भाजपा इसे कानून-व्यवस्था और राजनीतिक नाटक के तौर पर पेश कर सकती है।
ममता बनर्जी पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि यदि राज्य में विरोध की गुंजाइश सीमित की गई तो पार्टी दिल्ली तक आंदोलन ले जाएगी। दूसरी ओर भाजपा लगातार यह संदेश देने में जुटी है कि जनता विकास और प्रशासनिक मुद्दों पर चर्चा चाहती है।
फिलहाल यह विवाद केवल दो सांसदों पर कथित हमलों तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में बंगाल की बदलती राजनीतिक तस्वीर, सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ता अविश्वास तथा जनमत को अपने पक्ष में करने की नई लड़ाई भी शामिल है।