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इतिहास में नहीं मिला संथाली वीरों को पूरा सम्मान: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू

अतरराष्ट्रीय संथाली सम्मेलन में राष्ट्रपति ने कहा शिक्षा और कौशल से आगे बढ़ें युवा, लेकिन भाषा-संस्कृति और प्रकृति से न टूटे जुड़ाव।

By श्वेता सिंह

Mar 07, 2026 19:15 IST

कोलकाताः राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संथाली समुदाय के योगदान को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। उन्होंने कहा कि कई महान संथाली नायकों के नाम इतिहास में “जानबूझकर शामिल नहीं किए गए”। हालांकि उनके संघर्ष और बलिदान देश के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाली सम्मेलन को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने संथाली समुदाय के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लगभग 240 वर्ष पहले बाबा तिलका मांझी ने शोषण के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाया था। इसके करीब 60 साल बाद सिदो-कान्हू और चांद-भैरव ने अपनी बहनों फूलो-झानो के साथ मिलकर 1855 में ऐतिहासिक संथाल हूल का नेतृत्व किया। राष्ट्रपति ने कहा कि संथाली समाज के कई ऐसे वीर हैं जिनका नाम इतिहास में दर्ज नहीं हो सका। उनके मुताबिक यदि उन सभी के नाम इतिहास में शामिल किए जाते, तो इतिहास के पन्ने उनके योगदान से भर जाते।

उन्होंने संथाली समाज के साहस और आत्मसम्मान की सराहना करते हुए कहा कि यह समुदाय हीन भावना को स्वीकार नहीं करता और अन्याय के खिलाफ लड़ने का साहस रखता है।

विकास की रफ्तार पर भी उठाए सवाल

राष्ट्रपति मुर्मू ने कुछ क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों के विकास की धीमी गति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इस क्षेत्र में रहने वाले संथाली और अन्य आदिवासी समुदायों तक विकास का पूरा लाभ पहुंच पाया है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस तरह के सम्मेलनों के आयोजन में भी कभी-कभी बाधाएं आती हैं। उनके मुताबिक ऐसा लगता है कि कुछ लोग नहीं चाहते कि संथाली समाज आगे बढ़े, शिक्षित हो और एकजुट होकर मजबूत बने।

भाषा और पहचान को अहमियत देने पर जोर

राष्ट्रपति ने कहा कि 2003 का वर्ष संथाली समुदाय के इतिहास में महत्वपूर्ण है, जब संथाली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पिछले वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर संविधान का संथाली भाषा में ओल चिकी लिपि में संस्करण जारी किया गया था। उन्होंने पंडित रघुनाथ मुर्मू को भी श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने 1925 में ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया था। इस लिपि के जरिए संथाली भाषा को अभिव्यक्ति का नया माध्यम मिला और साहित्य तथा सामाजिक चेतना के प्रसार में मदद मिली।

युवाओं से जड़ों से जुड़ने की अपील

राष्ट्रपति ने आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक विरासत का जिक्र करते हुए कहा कि जनजातीय समाज ने सदियों से लोकगीत, नृत्य, परंपराएं और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को सहेजकर रखा है। उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास की राह पर आगे बढ़ते हुए भी इन परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण की भावना को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है। राष्ट्रपति मुर्मू ने संथाली युवाओं से अपील की कि वे शिक्षा और कौशल विकास के जरिए आगे बढ़ें, लेकिन अपनी भाषा, संस्कृति और जड़ों को न भूलें। उन्होंने कहा कि समाज में एकता और भाईचारे को मजबूत करते हुए ही एक सशक्त समाज और मजबूत भारत का निर्माण संभव है।

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