मुंबई : पिछले साल से ही भारत के शेयर बाजार से विदेशी निवेश निकलना शुरू हो गया था। 2025 में विदेशी निवेश के आउटफ्लो ने नया रिकॉर्ड बना दिया। 2026 में भी यह प्रवृत्ति जारी है। पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे माहौल के कारण यह प्रवृत्ति और बढ़ गई है।
इस स्थिति में इन्वेस्टमेंट बैंकिंग संस्था जेफरीज के विश्लेषक क्रिश वुड ने दो शर्तों का जिक्र किया है। उनका मानना है कि इन दो शर्तों के पूरा होने पर ही विदेशी निवेश भारत के बाजार में वापस लौट सकता है।
जेफरीज के ग्लोबल हेड ऑफ इक्विटी स्ट्रैटेजी क्रिश वुड के अनुसार पहली शर्त अंतरराष्ट्रीय सेमीकंडक्टर और एआई निवेश से जुड़ी है। उनके मुताबिक अगर वैश्विक बाज़ार में सेमीकंडक्टर ट्रेड के उछाल के थमने के स्पष्ट संकेत मिलते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय निवेशक फिर से भारत के बाजार की ओर ध्यान दे सकते हैं।
फिलहाल दुनिया भर में बड़ी मात्रा में पैसा एआई और सेमीकंडक्टर कंपनियों में जा रहा है। अगर यह प्रवृत्ति कम होती है, तो भारत जैसे बाजारों में फिर से निवेश बढ़ सकता है।
वुड ने अपने ‘Greed & Fear’ नोट में लिखा है कि एआई कैपेक्स को लेकर सवाल जितने बढ़ेंगे, इस चक्र के शिखर पर पहुंचने की संभावना उतनी ही बढ़ेगी। उनके अनुसार कई विश्लेषकों का मानना है कि 2026 एआई कैपेक्स का शीर्ष वर्ष हो सकता है।
दूसरी शर्त भारत के घरेलू बाज़ार से जुड़ी है। वुड के मुताबिक अगर भारतीय शेयर बाज़ार में बड़ा करेक्शन होता है, तो विदेशी निवेश फिर से लौट सकता है। खासकर अगर घरेलू म्यूचुअल फंड में आने वाला पैसा अचानक कम हो जाए, तो बाजार में बड़ा सुधार देखने को मिल सकता है। हालांकि फिलहाल घरेलू निवेश की धारा अभी भी मजबूत बनी हुई है।
हालिया आंकड़ों के अनुसार सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) में हर महीने औसतन लगभग 30,500 करोड़ रुपये का निवेश हो रहा है। इसके कारण बाज़ार में लगातार पैसा आ रहा है।
वुड का मानना है कि विदेशी निवेश का हालिया बहिर्गमन भारत की मूल आर्थिक कमजोरी के कारण नहीं है। बल्कि वैश्विक बाजार में एआई और सेमीकंडक्टर थीम में बड़े निवेश के कारण यह बदलाव देखने को मिल रहा है। उनके मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद अभी भी मजबूत बनी हुई है।