लखनऊ: अखिलेश यादव ने शनिवार को कहा कि शंकराचार्य के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना शब्दिक हिंसा और पाप है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि शंकराचार्य के खिलाफ बेहद अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना शब्दिक हिंसा और पाप दोनों है। उन्होंने कहा कि यह बात कहने वाला ही नहीं बल्कि मेज थपथपाकर उसका समर्थन करने वाले लोग भी दोषी हैं। जब भाजपा विधायक सदन से बाहर निकलकर जनता के बीच जाएंगे, तो जनता उन्हें सबक सिखाएगी। उनकी यह टिप्पणी एक दिन बाद आई, जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में कहा था कि हर कोई शंकराचार्य की उपाधि इस्तेमाल करने का हकदार नहीं है और हर कार्यक्रम में धार्मिक मर्यादा और कानून का शासन बनाए रखना जरूरी है।
अखिलेश यादव ने कहा कि जो लोग महाकुंभ में हुई मौतों के सही आंकड़े नहीं बताते, मुआवजे के भुगतान में भी गड़बड़ी करते हैं और यह नहीं बताते कि जिन लोगों को मुआवजा नहीं मिला उनका पैसा कहां गया, उन्हें किसी की धार्मिक स्थिति पर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने कानून का शासन और विधि का शासन का जिक्र करते हुए कहा कि जब सच्चाई सामने आएगी तो क्या फिर से सदन बुलाकर विधि का शासन लागू किया जाएगा? उन्होंने कहा कि जब इंसानियत की जगह अहंकार बोलता है तो संस्कृति विकृति में बदल जाती है और व्यक्ति समाज में सम्मान खो देता है।
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री धर्म के मुद्दे पर भी नफरत की राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य के खिलाफ की गई अमर्यादित टिप्पणी अब हमेशा के लिए सदन की कार्यवाही में दर्ज हो गई है। अगर इसे निंदनीय कहें तो निंदनीय शब्द भी छोटा पड़ जाएगा। यह बयान प्रयागराज में माघ मेला के दौरान जिला प्रशासन और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच हुए विवाद के बाद आया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को विधानसभा में कहा था कि हर व्यक्ति अपने नाम के आगे शंकराचार्य नहीं लिख सकता। हर कोई किसी पीठ का आचार्य होने का दावा कर माहौल खराब नहीं कर सकता। सभी को मर्यादा में रहना होगा।
यह विवाद उस समय शुरू हुआ था जब मौनी अमावस्या के दिन 18 जनवरी को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को संगम में स्नान के लिए जाते समय रोका गया था। विधानसभा में मुख्यमंत्री ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि जो लोग नैतिकता की बात करते हैं, उन्हें आत्मचिंतन भी करना चाहिए। माघ मेला के प्रबंधन का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि जब एक ही स्थान पर साढ़े चार करोड़ से अधिक श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं तो भगदड़ जैसी स्थिति से बचने के लिए सख्त व्यवस्था जरूरी होती है। उन्होंने कहा कि जहां करोड़ों श्रद्धालु स्नान के लिए पहुंचे हों, वहां जिस गेट से लोग बाहर निकलते हैं, उसी गेट से प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसा करने से भगदड़ मच सकती है और लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है।