जयपुर: मकर संक्रांति की सुबह पुराने शहर के जौहरी बाजार, चांदपोल, त्रिपोलिया, हवा महल और परकोटों की छतों से “वो काटा” की आवाजें सुनाई देने लगती हैं। इतिहासकारों के अनुसार जयपुर में पतंगबाजी की शुरुआत 19वीं सदी में हुई। पतंगबाजी, जयपुर की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गया। आज भी यह परंपरा शहर की छतों, गलियों और बाजारों में जीवित है।
जयपुर की पतंगबाजी केवल खेल और मनोरंजन तक सीमित नहीं है। बुधवार को लोगों ने नदियों और तालाबों में पवित्र स्नान किया, मंदिरों में पूजा-अर्चना की, पशुओं को चारा खिलाया और मिठाइयां बांटी, इस तरह राजस्थान में फसल पर्व मकर संक्रांति पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, पतंग उड़ाना इस पर्व की प्रमुख गतिविधि है, जो दिन बड़े होने की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। हालांकि जयपुर में मौसम साफ रहा लेकिन सुबह के समय हवा की अनुकूल स्थिति न होने के कारण पतंग उड़ाने के शौकीनों को निराशा का सामना करना पड़ा।
सुबह-सुबह श्रद्धालु अजमेर के पुष्कर सरोवर और जयपुर के गलता तीर्थ में पवित्र स्नान के लिए उमड़ पड़े। इस वर्ष मकर संक्रांति का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि यह एकादशी के दिन पड़ी।गोविंद देवजी मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे श्रद्धालु हिमांशु गुप्ता ने कहा कि यह एक बेहद शुभ अवसर है और मैं अपने पूरे परिवार के साथ इस दिन मंदिर दर्शन करता हूं।
राज्य के गोविंद देवजी मंदिर, ताड़केश्वरजी मंदिर और अन्य प्रमुख मंदिरों को फूलों और पतंगों से सजाया गया था। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने पर्यटन विभाग द्वारा जल महल के पास आयोजित पतंग महोत्सव में हिस्सा लिया। इसके अलावा, मांझे से घायल पक्षियों के इलाज के लिए भी विशेष इंतजाम किए गए। शहर के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न सामाजिक संगठनों ने शिविर लगाकर घायल पक्षियों को बचाने और उनका उपचार करने का काम किया।