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मंधाना–वोल की तांडव वाली जोड़ी, RCB ने चौथे फाइनल में दिल्ली को हराया

203 रन का पीछा आसान बना, रिकॉर्ड साझेदारी ने चैंपियनशिप तय की।

By श्वेता सिंह

Feb 05, 2026 23:58 IST

वडोदराः वडोदरा में खेले गए महिला प्रीमियर लीग (WPL) फाइनल ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि बड़े मुकाबलों में मानसिक मजबूती और मौके भुनाने की कला ही चैंपियन और रनर-अप के बीच फर्क पैदा करती है। स्मृति मंधाना की कप्तानी में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) ने दमदार बल्लेबाजी का प्रदर्शन करते हुए दिल्ली कैपिटल्स को छह विकेट से हराकर अपना दूसरा WPL खिताब जीत लिया, जबकि दिल्ली को लगातार चौथे फाइनल में भी निराशा हाथ लगी।

दिल्ली कैपिटल्स ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 203 रन का मजबूत स्कोर खड़ा किया। कप्तान जेमिमा रोड्रिग्स ने जिम्मेदारी भरी अर्धशतकीय पारी खेली, वहीं चिनेल हेनरी की 15 गेंदों में 35 रन की आक्रामक पारी ने टीम को बड़े स्कोर तक पहुंचाया। लौरा वोल्वार्ड्ट और लिजेल ली की तेज शुरुआत ने यह संकेत दे दिया था कि दिल्ली फाइनल में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। कागज पर यह स्कोर मैच जिताऊ लग रहा था।

लेकिन असली कहानी दूसरी पारी में लिखी गई। लक्ष्य का पीछा करते हुए RCB की शुरुआत भले ही ग्रेस हैरिस का विकेट जल्दी गिरने से लड़खड़ाई, लेकिन इसके बाद स्मृति मंधाना और जॉर्जिया वोल ने मैच का रुख पूरी तरह पलट दिया। दोनों के बीच दूसरे विकेट के लिए 165 रन की साझेदारी न सिर्फ इस फाइनल की पहचान बनी, बल्कि WPL इतिहास की सबसे प्रभावशाली साझेदारियों में भी शामिल हो गई।

मंधाना की 41 गेंदों में 87 रन की पारी नेतृत्व की परिभाषा थी-आत्मविश्वास, आक्रामकता और मैच की मांग के अनुसार शॉट चयन। दूसरी ओर जॉर्जिया वोल की 79 रन की पारी ने दिल्ली के गेंदबाजों को लगातार दबाव में रखा। दोनों ने पावरप्ले से लेकर डेथ ओवर्स तक रन रेट को नियंत्रण में रखा, जिससे लक्ष्य कभी असंभव नहीं लगा।

दिल्ली के लिए चिंता की बात यह रही कि इतने बड़े स्कोर के बावजूद वे निर्णायक मौकों पर विकेट नहीं निकाल सकीं। वोल का विकेट गिरने के बाद एक पल के लिए मुकाबला बराबरी की ओर जाता दिखा, लेकिन RCB की बल्लेबाजी इकाई ने संयम दिखाया और दो गेंद शेष रहते मैच खत्म कर दिया।

यह जीत RCB को मुंबई इंडियंस के साथ WPL की सबसे सफल टीमों की सूची में खड़ा करती है, वहीं दिल्ली कैपिटल्स के लिए यह हार ‘करीब आकर चूकने’ की एक और कहानी बन गई। चार फाइनल खेलना निरंतरता का प्रमाण है, लेकिन खिताब न जीत पाना उनके लिए सबसे बड़ा सवाल बना रहेगा।

कुल मिलाकर, यह फाइनल सिर्फ एक ट्रॉफी का फैसला नहीं था, बल्कि यह भी दिखाता है कि बड़े मंच पर साहसिक क्रिकेट और नेतृत्व कैसे इतिहास रच देता है और कैसे एक पल की चूक सालों की मेहनत पर भारी पड़ जाती है।

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