नयी दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज की याचिका खारिज कर दी, जिसमें पार्टी ने 2025 बिहार विधानसभा चुनाव रद्द करने की मांग की थी। पार्टी ने आरोप लगाया था कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 15,600 करोड़ रुपये वितरित किए गए। यह मॉडल कोड ऑफ कॉन्डक्ट का उल्लंघन है और अन्य राजनीतिक दलों के लिए बराबरी का मैदान नहीं छोड़ता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूरे राज्य के चुनाव को रद्द करने की मांग अदालत के दायरे में नहीं आती।
प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसकी मांग को मानने से इंकार कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने जनसुराज पार्टी को पहले हाईकोर्ट जाने को कहा है, इसके बाद जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली है।
याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की बेंच ने कहा कि यह याचिका केवल मशहूर होने की कोशिश मात्र है। सीजेआई सूर्यकांत ने जनसुराज को खरी खरी सुनाई और कहा कि जनता ने आपको खारिज कर दिया है। इसलिए आप लोकप्रिय होने के लिए सुप्रीम कोर्ट जैसे न्यायिक मंचों का इस्तेमाल करना चाह रहे हैं। यह बिल्कुल नहीं चलेगा। बेंच ने टिप्पणी की कि अगर योजना को चुनौती देनी थी तो उसका समय पहले था। न्यायाधीशों ने इसे पूरे राज्य के चुनाव को रद्द कराने वाली याचिका बताया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि गंभीर मामलों में फ्रीबी वितरण पर समीक्षा की जा सकती है लेकिन इस याचिका में ऐसा कोई मामला नहीं है।
जन सुराज पार्टी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह ने बताया कि योजना चुनाव से ठीक पहले घोषित की गई थी। इसका भुगतान MCC लागू होने के दौरान किया गया। सिंह ने कहा कि राज्य के पास भारी वित्तीय घाटा है। यह राशि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डायरेक्ट ट्रांसफर स्कीम अलग होती है और यह योजना महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए थी।
भाजपा नेतृत्व वाले NDA ने 243 सदस्यीय विधानसभा में 202 सीटें जीतकर सत्ता बनाए रखी। हालांकि इंडिया ब्लॉक ने 35 सीटें हासिल कीं। जन सुराज पार्टी किसी भी सीट पर विजयी नहीं हुई और अधिकांश उम्मीदवारों की जमा राशि जब्त हो गई। याचिका में आरोप था कि मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को 10,000 रुपये का अनुदान चुनाव के बाद ही वितरित किया गया, जो MCC का उल्लंघन है। पार्टी ने संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के तहत कार्रवाई की मांग की थी।
विश्लेषकों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय राज्य में चुनाव प्रक्रिया की वैधता और निष्पक्षता को मजबूत करता है। यह मामला दिखाता है कि चुनाव हारने के बाद न्यायिक मंच का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता और चुनाव के दौरान योजनाओं के माध्यम से लाभ वितरण संवेदनशील मुद्दा है। न्यायालय ने संकेत दिया है कि भविष्य में गंभीर फ्रीबी वितरण मामलों की समीक्षा की जा सकती है। यह राज्य सरकारों के लिए चुनावी संवेदनशीलता पर ध्यान देने का संदेश है।
इस निर्णय से भाजपा/NDA के लिए राजनीतिक स्थिरता और वैधता को समर्थन मिला है। हालांकि विपक्षी दलों और नए राजनीतिक दलों के लिए यह संकेत है कि याचिका दायर करने से पहले रणनीति और समय का विशेष ध्यान रखना जरूरी है।