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चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणीः क्या संसद को कानून बनाने का निर्देश दे सकती है अदालत?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार, अदालत नहीं दे सकती निर्देश। याचिकाकर्ताओं का दावा- नए कानून से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर पड़ सकता है असर

By डॉ. अभिज्ञात

May 06, 2026 22:31 IST

नयी दिल्लीः बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या अदालत संसद को ऐसा कानून बनाने का निर्देश दे सकती है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को शामिल करना अनिवार्य किया जाए।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा के पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है और अदालतें संसद को कानून बनाने का आदेश नहीं दे सकतीं।

सुप्रीम कोर्ट मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। इस कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया गया था।

सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि यह अधिनियम कार्यपालिका को अत्यधिक प्राथमिकता देता है और संविधान पीठ के उस फैसले के विपरीत है, जिसमें नियुक्तियों के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति का प्रावधान किया गया था।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि चयन समिति में सीजेआई को शामिल करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट का पूर्व निर्णय उस समय की अंतरिम व्यवस्था थी, जब तक संसद कोई कानून नहीं बना देती। अदालत ने कहा कि उस समय केवल कुछ मानक तय किए गए थे ताकि कानून बनने तक प्रक्रिया चल सके। न्यायाधीशों ने सवाल किया कि जब संसद ने कानून बना दिया है तो क्या यह कहा जा सकता है कि वे मानक लागू नहीं किए गए।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में तर्क रखा कि 2023 का यह कानून व्यावहारिक रूप से ऐसे उम्मीदवारों की नियुक्ति सुनिश्चित करता है जिन्हें प्रधानमंत्री की पसंद माना जाता है। इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित होती है। उनका कहना था कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की नियुक्ति प्रक्रिया पर सत्तारूढ़ दल का नियंत्रण नहीं होना चाहिए। मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।

सुनवाई की शुरुआत में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से अनुरोध किया कि मामले की सुनवाई अगले सप्ताह के लिए टाल दी जाए क्योंकि वह सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों वाले संविधान पीठ के समक्ष सबरीमाला मामले में व्यस्त हैं। हालांकि पीठ ने यह अनुरोध ठुकरा दिया और कहा कि यह मामला किसी भी अन्य मामले से अधिक महत्वपूर्ण है।इससे पहले वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

यह याचिकाएं एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर), मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस समिति की महासचिव जया ठाकुर, संजय नारायणराव मेश्राम, धर्मेंद्र सिंह कुशवाहा और अधिवक्ता गोपाल सिंह की ओर से दायर की गई थीं। याचिकाओं में कहा गया कि नया कानून चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराता, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन होता है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर करना सुप्रीम कोर्ट के 2 मार्च 2023 के फैसले के विपरीत है। उस फैसले में कहा गया था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, सीजेआई और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष वाली समिति की सलाह पर की जाएगी।

याचिकाओं के अनुसार चयन प्रक्रिया से सीजेआई को हटाने के बाद प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित सदस्य नियुक्तियों में हमेशा निर्णायक भूमिका निभाएंगे, जिससे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का प्रभाव कमजोर पड़ जाता है। याचिकाओं में विशेष रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 7 और 8 को चुनौती दी गई है। इन धाराओं में चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को फिर से शामिल किया जाए। वर्तमान में इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। यह नया कानून चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तें और कार्य संचालन) अधिनियम, 1991 की जगह लाया गया था।


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