नई दिल्लीः भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार की संभावनाओं के बीच अमेरिका के प्रमुख परमाणु उद्योग प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में भारत का दौरा किया। चार दिवसीय इस यात्रा का नेतृत्व यूएस-इंडिया स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फोरम (यूएसआईएसपीएफ) और न्यूक्लियर एनर्जी इंस्टीट्यूट (एनईआई) ने संयुक्त रूप से किया। प्रतिनिधिमंडल में रिएक्टर डेवलपर्स, इंजीनियरिंग, न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल, उपकरण आपूर्तिकर्ता और परमाणु सेवाओं से जुड़ी कई अमेरिकी कंपनियां शामिल थीं।
नई दिल्ली और मुंबई में प्रतिनिधिमंडल ने भारत सरकार, राज्य सरकारों और नियामक संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारियों से व्यापक चर्चा की। इस दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर, परमाणु ऊर्जा विभाग में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा आंध्र प्रदेश के मंत्री नारा लोकेश और लोकसभा सांसद श्रीकृष्ण देवरायालु लावु समेत कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात हुई। इसके अलावा परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई), न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) और एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (एईआरबी) के अधिकारियों के साथ भी बैठकें हुईं।
दौरे के दौरान नई दिल्ली और मुंबई में उद्योग जगत के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें नीति निर्माता, राजनयिक, उद्योगपति और परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के हितधारक शामिल हुए। चर्चाओं में परमाणु परियोजनाओं के विकास, सप्लाई चेन मजबूत करने और दीर्घकालिक व्यावसायिक साझेदारी पर जोर दिया गया। राज्य सरकारों के साथ स्थानीय स्तर पर विनिर्माण साझेदारी और परमाणु परियोजनाओं को बढ़ावा देने पर भी चर्चा हुई।
यूएसआईएसपीएफ और एनईआई ने बताया कि भारत रवाना होने से पहले अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने प्रतिनिधिमंडल को संबोधित किया। इस दौरान भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग को लेकर रणनीतिक चर्चा की गई। संस्थाओं के अनुसार भारत में निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियां अब परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश की संभावनाएं तलाश रही हैं, जिससे ऊर्जा सुरक्षा, निवेश और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
एनईआई की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी मारिया कोर्सनिक ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लागू शांति अधिनियम भारत के परमाणु ऊर्जा भविष्य के लिए ऐतिहासिक अवसर लेकर आया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका उन्नत तकनीक और नवाचार क्षमता प्रदान कर सकता है, जबकि भारत के पास मजबूत विनिर्माण क्षमता और दशकों का अनुभव है। यदि इन सुधारों को प्रभावी तरीके से लागू किया गया तो भारत में स्वच्छ और विश्वसनीय बिजली उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
यूएसआईएसपीएफ के अध्यक्ष डॉ. मुकेश आघी ने कहा कि दिसंबर 2025 में लागू शांति अधिनियम ने पहली बार निजी क्षेत्र के लिए परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में बड़े अवसर खोले हैं। उनके अनुसार अमेरिकी तकनीक भारत की बेसलोड क्षमता और तेजी से बढ़ते डाटा सेंटर सेक्टर की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मददगार साबित हो सकती है।
शांति अधिनियम 2025 को भारत की परमाणु ऊर्जा नीति में छह दशकों बाद सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इसके तहत 1962 के एटॉमिक एनर्जी एक्ट और 2010 के सिविल लाइबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट को समाप्त कर क्षेत्र को अधिक बाजार आधारित ढांचे की ओर बढ़ाया गया है।
भारत ने वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 7.5 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। रिपोर्ट के अनुसार इस लक्ष्य को पूरा करने में भारत-अमेरिका औद्योगिक साझेदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। देश में तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डाटा सेंटरों की बढ़ती मांग के बीच परमाणु ऊर्जा को चौबीसों घंटे स्थिर बिजली आपूर्ति के लिए अहम विकल्प माना जा रहा है।
भारत सरकार ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा पर विशेष जोर दे रही है। यूएसआईएसपीएफ अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने वाला स्वतंत्र गैर-लाभकारी संस्थान है, जबकि एनईआई अमेरिकी वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा उद्योग का प्रमुख प्रतिनिधि संगठन है।