वॉशिंगटन डी॰ सी॰ : डोनाल्ड ट्रंप की युद्धनीति हमेशा से ‘क्विक डील’ या तेज समझौते पर निर्भर रही है। ईरान में भी वह वही ‘वेनेज़ुएला मॉडल’ लागू करना चाहते थे लेकिन युद्ध की दिशा का विश्लेषण करने पर दिख रहा है कि तेहरान की ‘असिमेट्रिक एंड्योरेंस’ या ‘अप्रतिसम सहनशीलता’ की रणनीति के सामने ट्रंप की वह योजना व्यावहारिक रूप से टिक नहीं पा रही है। रणकौशल में ही वह 10 गोल खा रहे हैं।
ट्रंप का ‘वेनेज़ुएला मॉडल’: लक्ष्य क्या था?
वेनेज़ुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण कर सरकारी ढांचे को अक्षुण्ण रखते हुए स्थिति को नियंत्रण में ले आए थे ट्रंप। कार्यवाहक राष्ट्रपति रोड्रिगेज ने भी ट्रंप के खिलाफ गर्मागर्म बातें कही थीं राष्ट्रपति मादुरो को छुड़ाकर लाने की घोषणा की थी।
लेकिन वह जो भी हों मादुरो नहीं हैं। वेनेज़ुएला को तेल से वंचित करना, मादुरो की कानूनी लड़ाई में वेनेज़ुएलन सरकार के धन के इस्तेमाल को रोकना इनमें से किसी को भी वह रोक नहीं पाए। ट्रंप ने सोचा था कि ईरान में भी कुछ ऐसा ही होगा।
युद्ध के पहले ही दिन ईरान के सुप्रीम लीडर आयातोल्ला अली खामेनेई को हटा दिया है अमेरिकी-इजरायली संयुक्त बलों ने। सिर्फ खामेनेई ही नहीं, IRGC के 40 शीर्ष कमांडरों सहित इस्लामी क्रांतिकारी सरकार का पूरा सिर ही काट कर अलग कर दिया गया। ट्रंप ने सोचा था इसके बाद ही ईरान सिर झुका देगा।
लक्ष्य था खामेनेई की जगह अपेक्षाकृत ‘कम कट्टरपंथी’ किसी नेतृत्व को सत्ता में बैठाना। जो अमेरिका के साथ ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर जल्दी समझौता करेगा।
अर्थात पूरे देश को नष्ट किए बिना, सिस्टम का सिर बदलकर अमेरिका का हित साधना लेकिन व्यवहार में ट्रंप की यह रणनीति पूरी तरह विफल हुई है। उनके साम्राज्यवादी घमंड पर जोरदार चोट की है ईरान ने। वेनेज़ुएला बनने के बजाय पश्चिम एशिया का यह देश धीरे-धीरे अफगानिस्तान बनने की दिशा में बढ़ने लगा है।
क्यों विफल हो रही है ट्रंप की योजना?
पहले ही ईरान की रणनीति को लेकर लंबी चर्चा हो चुकी है। खामेनेई सहित पूरे शीर्ष नेतृत्व की मृत्यु के बावजूद ईरान नहीं टूटा है। अभी तक सिर झुकाने की कोई योजना दिखाई नहीं दे रही। बल्कि उन्होंने एक दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक युद्ध शुरू कर दिया है।
वे अच्छी तरह जानते हैं कि सीधे सैन्य शक्ति में वे अमेरिका या इजरायल का मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए उनकी रणनीति है युद्ध को जितना संभव हो उतना लंबा खींचकर अमेरिका के धैर्य और धन की परीक्षा लेना। युद्ध जितना लंबा होगा, उतना ही खर्च और मारे गए अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़ेगी। और उतना ही ट्रंप अमेरिकी जनता के बीच अलोकप्रिय होंगे ऐसी ही उम्मीद है उनकी।
पहले ही 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो चुकी है और कम से कम 18 गंभीर रूप से घायल हैं। 3 F-15E युद्धविमान गिर चुके हैं। कतर के अल उबैद बेस में 1.1 बिलियन डॉलर का AN/FPS-132 प्रारंभिक चेतावनी रडार नष्ट हो गया है सऊदी अरब में AN/TPY-2 रडार , बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट के उपग्रह संचार टर्मिनल क्षतिग्रस्त हुए हैं।
अमेरिका - इजरायल युद्ध की लागत और बढ़ाने के लिए ईरान अपने सस्ते ड्रोन और मिसाइलों के साथ सस्ते डिकॉय का इस्तेमाल कर हमला कर रहा है। और उन्हें नष्ट करने में अमेरिका और इजरायल के महंगे मिसाइल इंटरसेप्टर खत्म होते जा रहे हैं। खर्च तेजी से बढ़ रहा है।
सिर्फ इतना ही नहीं ईरान ने युद्ध को केवल अपने भूभाग तक सीमित नहीं रखा है। इराक और लेबनान जैसे क्षेत्रों में भी इसे फैला दिया है। हिज़्बुल्लाह, हाउथी जैसे ईरान समर्थित लड़ाकू समूह अमेरिका-इजरायल को युद्ध में व्यस्त रखे हुए हैं।
आंतरिक विद्रोह का अभाव
साथ ही वाशिंगटन को उम्मीद थी कि अमेरिका - इजरायल बाहर से हमला करेंगे तो कुर्द या बलोच जनजातियां विद्रोह कर देंगी। मौजूदा शासक वर्ग के विरोधी ईरानी आम लोग भी सड़कों पर उतर आएंगे। पेंटागन की वह उम्मीद अब तक पूरी नहीं हुई। उलटे स्कूलों पर हमले, खामेनेई की हत्या के विरोध में ईरान की सड़कों पर अमेरिका - इजरायल विरोधी प्रदर्शन देखे गए हैं।
हॉर्मुज के फंदे में दबाव में विश्व अर्थव्यवस्था
ट्रंप पर दबाव बनाने का सबसे बड़ा ईरानी हथियार है हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य। दुनिया के लगभग 20-25 प्रतिशत तेल और लिक्विफाइड नैचुरल गैस या LNG का बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है।
युद्ध शुरू होने के बाद से इस जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही लगभग बंद कर दी है ईरान ने। साफ कह दिया है इधर से जाने की कोशिश की तो चाहे जिसका भी जहाज हो, हम आग लगा देंगे। बुधवार को ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी ISNA ने बताया कि अब तक 10 जहाजों पर हमला किया गया है। इसके परिणामस्वरूप विश्व बाजार में ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगी हैं।
भारत के आयातित तेल का आधा इसी रास्ते से आता है। इसलिए यह स्थिति लंबे समय तक रही तो भारत जैसे देशों में गंभीर तेल और गैस संकट पैदा होगा। हालांकि कुछ भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत अमेरिका पर दबाव डालने की स्थिति में नहीं है। व्यापार समझौते का दबाव भी है।
लेकिन भारत की तरह ही स्थिति जापान, दक्षिण कोरिया जैसे अमेरिका के सहयोगी देशों या चीन जैसे विरोधी देश की भी होगी। इसलिए युद्ध बंद करने के लिए मित्र और शत्रु दोनों तरफ से ट्रंप पर दबाव बढ़ता जाएगा।
घरेलू राजनीति और ‘MAGA’ फैक्टर
ट्रंप की सबसे बड़ी कमजोरी है अमेरिका की आंतरिक राजनीति। सामने ही मिड-टर्म चुनाव हैं। उससे पहले इस युद्ध को लेकर अमेरिका के अधिकांश अर्थशास्त्री गंभीर महंगाई की आशंका जता रहे हैं।
ईंधन की कीमत बढ़ने पर पहले से महंगाई से जूझ रही अमेरिकी अर्थव्यवस्था और खराब हो जाएगी। पहले ही इस युद्ध में ट्रंप भारी खर्च कर चुके हैं। युद्ध लंबे समय तक चला तो अमेरिकियों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।
मार्जरी टेलर ग्रीन, टकर कार्लसन, थॉमस मैसी, निक फुएंतस जैसे ‘MAGA’ यानी ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ आंदोलन के समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा पहले ही कह चुका है कि वे युद्ध नहीं चाहते। अगर लंबा और खूनी युद्ध चलता रहा तो ‘MAGA’ समर्थकों के बीच भी ट्रंप की लोकप्रियता गिर सकती है।
और स्थिति उसी दिशा में बढ़ती दिख रही है। ईरान विशेषज्ञ एली गेरानमायेह के अनुसार ट्रंप चाहें तो शुरुआत में ही खामेनेई की हत्या की सफलता का दावा कर युद्ध से बाहर निकल सकते थे लेकिन वह मौका चूककर अब वह अभिमन्यु के चक्रव्यूह में फंसने की तरह फंस गए हैं।
ईरान को नहीं है धोखे का डर
सैन्य विश्लेषकों के अनुसार ईरान के लिए अब टिके रहना ही जीत है। चाहे उन्हें कितना भी नुकसान क्यों न हो। ट्रंप के लिए युद्धविराम के लिए दबाव डालना भी आसान नहीं है। ईरान के शीर्ष नेतृत्व को अमेरिका - इजरायल खत्म कर चुके हैं। अब बातचीत किससे होगी?
कोई केंद्रीय नेतृत्व अब ईरान का युद्ध नहीं चला रहा है। ईरान की सेना के पास अब खोने के लिए कुछ नहीं है। इसलिए वे जितने दिन संभव होगा उतने दिन तक मरते-मारते लड़ते रहेंगे। मिसाइलों का भंडार खत्म हो जाने पर भी ‘मोजेक स्ट्रैटेजी’ के तहत युद्ध जारी रखेंगे।
इजरायल के लिए हालांकि यह स्थिति फायदेमंद हो सकती है। कुछ भू-राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि गाजा की तरह वह ईरान को भी पूरी तरह नष्ट करना चाहता है लेकिन युद्ध जितना लंबा चलेगा महंगाई उतनी बढ़ेगी और ट्रंप का राजनीतिक भविष्य उतना ही संकट में पड़ेगा।
खामेनेई को हटाकर ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर देने के बाद भी क्या ट्रंप इस चक्रव्यूह से, इस दलदल से बाहर निकल पाएंगे? जवाब छिपा है आने वाले कुछ हफ्तों की रणनीति में। नहीं तो अंततः वही वेनेज़ुएला मॉडल ट्रंप की सत्ता पलटने का कारण भी बन सकता है।