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क्या सरकारें युद्ध की सच्चाई जनता से दूर रखना चाहती हैं? पीट हेगसेथ के बयान पर बहस तेज

युद्ध की मानवीय कीमत और मीडिया: हेगसेथ की टिप्पणी ने पुरानी बहस फिर छेड़ी।

By श्वेता सिंह

Mar 06, 2026 21:55 IST

वॉशिंगटनः अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की हालिया टिप्पणी ने एक पुरानी लेकिन अहम बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है-युद्ध की मानवीय कीमत को लेकर सरकार और मीडिया के बीच तनाव। हेगसेथ ने आरोप लगाया कि अमेरिकी मीडिया ईरान के साथ जारी युद्ध में अमेरिकी सैनिकों की मौत को इसलिए प्रमुखता से दिखाता है ताकि राष्ट्रपति की छवि खराब हो।

दरअसल यह टिप्पणी उस समय आई जब कुवैत में एक ऑपरेशन सेंटर पर ईरानी हमले में अमेरिकी सेना के छह रिज़र्विस्ट मारे गए। पेंटागन में ब्रीफिंग के दौरान हेगसेथ ने कहा कि जब भी “कुछ ड्रोन घुस जाते हैं या कोई दुखद घटना होती है, तो वह तुरंत फ्रंट पेज की खबर बन जाती है।” उनके मुताबिक मीडिया ऐसा करके राष्ट्रपति को खराब दिखाना चाहता है और युद्ध की वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज करता है।

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने भी इस टिप्पणी का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मीडिया प्रशासन के हर बयान को राष्ट्रपति के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश करता है।

वियतनाम युद्ध से शुरू हुई बड़ी बहस

युद्ध की कवरेज को लेकर सरकार और मीडिया के बीच यह खींचतान नई नहीं है। 1960 के दशक में वियतनाम युद्ध के दौरान पहली बार अमेरिकी घरों तक युद्ध के बेहद वास्तविक और दर्दनाक दृश्य टीवी के जरिए पहुंचने लगे थे। हर रात प्रसारित होने वाली मौत और तबाही की तस्वीरों ने अमेरिकी समाज पर गहरा असर डाला और कई विशेषज्ञों का मानना है कि इसी से युद्ध के प्रति जनसमर्थन धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।

युद्ध कवरेज का बदलता स्वरूप

समय के साथ युद्ध की रिपोर्टिंग और पत्रकारों की पहुंच दोनों बदल गए हैं। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, वियतनाम युद्ध को अमेरिकी इतिहास में पत्रकारों के लिए सबसे खुला युद्ध माना जाता है। 1968 में जब सीबीएस के लोकप्रिय एंकर वॉल्टर क्रोंकाइट ने वियतनाम से रिपोर्टिंग करते हुए कहा कि इस संघर्ष का व्यावहारिक समाधान बातचीत के जरिए ही संभव है, तो उस समय के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने टिप्पणी की थी कि “अगर मैंने क्रोंकाइट को खो दिया है, तो मैंने मिडिल अमेरिका को खो दिया है।”

ताबूतों की तस्वीरों पर भी लगा था प्रतिबंध

1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान एक घटना ने इस बहस को और तेज किया। उस समय राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश नाराज हो गए थे जब टीवी चैनलों ने दो अलग-अलग फ्रेम में एक ओर अमेरिका लौटते सैनिकों के ताबूत दिखाए और दूसरी ओर व्हाइट हाउस में पत्रकारों से मजाक करते राष्ट्रपति की तस्वीरें प्रसारित हो गईं।

इसके बाद पेंटागन ने सैनिकों के ताबूतों की वापसी समारोह की कवरेज पर प्रतिबंध लगा दिया। आधिकारिक तौर पर इसे मृतकों के परिवारों की निजता की रक्षा बताया गया, लेकिन आलोचकों का कहना था कि असली मकसद युद्ध की कीमत को सार्वजनिक नजरों से दूर रखना था। यह प्रतिबंध बाद के वर्षों तक जारी रहा और बाद में इसे हटा दिया गया।

आधुनिक युद्ध: दूर से दिखती लड़ाई

आज के दौर में आम लोगों को युद्ध के जो दृश्य दिखाई देते हैं, वे अक्सर दूर से ली गई विस्फोटों की तस्वीरों या ड्रोन फुटेज जैसे होते हैं, जो कई बार वीडियो गेम की तरह लगते हैं। असली दर्द और मानवीय नुकसान अक्सर कैमरों से दूर ही रह जाता है।

अफगानिस्तान युद्ध को कवर करने वाली पत्रकार जेसिका डोनाती ने 2021 में लिखा था कि आज के समय में कई बार पत्रकारों के लिए अमेरिकी सेना के साथ रहकर रिपोर्टिंग करना उतना आसान नहीं होता, जितना पहले हुआ करता था।

सैनिकों की मौत की रिपोर्टिंग क्यों जरूरी

कई पत्रकारों का कहना है कि सैनिकों की मौत की खबरें दिखाना राजनीति नहीं, बल्कि उनके बलिदान को सम्मान देने का तरीका है। सीएनएन के पत्रकार जेक टेपर ने हेगसेथ की टिप्पणी को “इतिहास से कटा हुआ नजरिया” बताया। उनके अनुसार मीडिया शहीद सैनिकों की खबर इसलिए दिखाता है क्योंकि उन्होंने अपने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है।

वॉशिंगटन पोस्ट के सैन्य मामलों के रिपोर्टर डैन लामोथ ने भी कहा कि वे युद्ध में होने वाली मौतों की रिपोर्टिंग जारी रखेंगे, चाहे सत्ता में कोई भी राष्ट्रपति हो। उनका मानना है कि इससे सैनिकों और उनके परिवारों के त्याग को पहचान मिलती है और उन कमियों पर भी रोशनी पड़ती है जिनसे ऐसी घटनाएं होती हैं।

पूर्व संपादक रॉबर्ट एच. रीड के अनुसार सैनिकों के बारे में सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की कहानी भी बताई जानी चाहिए वे कहां पले-बढ़े, उनके सपने क्या थे और वे अपने पीछे किन लोगों को छोड़ गए।

आखिरकार विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध की असली तस्वीर दिखाना लोकतांत्रिक समाज के लिए जरूरी है। जैसा कि टिमोथी नफ्ताली कहते हैं - “जनता को यह समझना चाहिए कि युद्ध कोई वीडियो गेम नहीं है, यह लोगों की जिंदगी को प्रभावित करता है।”

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