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लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स क्या है? क्यों हर बजट में इसे हटाने की मांग उठती है?

आलोचकों के अनुसार लंबी अवधि की इक्विटी निवेश पर कर लगाने से भारत के पूंजी बाजार में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने का उद्देश्य कमजोर हो रहा है।

By अंशुमान गोस्वामी, Posted by : राखी मल्लिक

Jan 25, 2026 10:29 IST

नयी दिल्लीः केंद्रीय बजट आते ही शेयर बाजार में एक जाना-पहचाना सवाल बार-बार उठता है—क्या लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स हटा दिया जाएगा? दलाल स्ट्रीट से लेकर दीर्घकालिक निवेशक सभी के बीच इस कर पर चर्चा शुरू हो जाती है। कई लोगों का कहना है कि दीर्घकालिक इक्विटी निवेश पर कर लगाना भारत के कैपिटल मार्केट में आम जनता की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य को कमजोर कर रहा है।

LTCG टैक्स क्या है?

लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन का मतलब है किसी संपत्ति को निर्धारित समय से अधिक समय तक रखने के बाद उसे बेचने पर होने वाला लाभ। लिस्टेड शेयर और इक्विटी म्यूचुअल फंड के मामले में, यदि इन्हें 12 महीने से अधिक समय तक रखा जाता है तो इसे लॉन्ग टर्म माना जाता है। वर्तमान में सालाना 1 लाख रुपये से अधिक लाभ होने पर उस पर 10 प्रतिशत की दर से LTCG टैक्स देना होता है। इसमें इंडेक्सेशन का लाभ नहीं मिलता।

2018 के बजट में यह कर फिर से लागू किया गया। इसके पहले लंबे समय तक शेयर बाजार में लॉन्ग टर्म गेन टैक्स मुक्त था। सरकार का तर्क था कि इससे राजस्व बढ़ेगा और विभिन्न एसेट क्लास में संतुलन आएगा। हालांकि निवेशकों का एक हिस्सा मानता है कि इस कर के माध्यम से दीर्घकालिक बचत को हतोत्साहित किया जा रहा है।

निवेशक LTCG हटाने की मांग क्यों करते हैं?

निवेशकों का कहना है कि LTCG कर दीर्घकालिक रिटर्न को कम कर देता है। जो लोग रिटायरमेंट योजना या संपत्ति निर्माण के लिए शेयर बाजार में रहते हैं उनके लिए यह कर कंपाउंडिंग पर बड़ा असर डालता है। इंडेक्सेशन न होने के कारण मुद्रास्फीति से हुए लाभ पर भी कर देना पड़ता है।

LTCG को लेकर एक और बड़ी शिकायत यह है कि यह डबल टैक्सेशन जैसा है। कंपनी पहले कॉर्पोरेट टैक्स देती है। फिर डिविडेंड पर कर देना पड़ता है। उसके ऊपर फिर कैपिटल गेन पर कर लग जाता है। विशेषज्ञों का दावा है कि इससे एक ही आय पर बार-बार कर लग रहा है। जिससे भारत में निवेश का माहौल कम आकर्षक हो जाता है।

कुछ लोग कहते हैं कि LTCG कर के कारण निवेशक लाभ वाली शेयर बेचने से कतराते हैं। कर बचाने के लिए रिबैलेंसिंग टाल दी जाती है। इससे बाजार में लिक्विडिटी कम होती है और जोखिम बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों की राय

रेलिगेयर ब्रोकिंग के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट राजीव गुप्ता कहते हैं कि भारत धीरे-धीरे सेविंग-निर्भर अर्थव्यवस्था से निवेशक-निर्भर अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। उनके अनुसार दीर्घकालिक निवेश पर अतिरिक्त कर बाधा पैदा कर रहा है। वे कहते हैं कि मुद्रास्फीति से हुए लाभ पर भी कर लगाने से दीर्घकालिक निवेश की प्रोत्साहना कम हो जाती है। यदि विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल करना चाहता है तो नीति निर्धारकों को LTCG ढांचे पर फिर से विचार करना चाहिए।

इसी कारण बजट से पहले फिर सवाल उठता है- दीर्घकालिक निवेश पर कर रहेगा या सरकार बाजार अनुकूल नीति अपनाने के लिए कोई बदलाव करेगी?

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