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यूएन रिपोर्ट: भारत की अर्थव्यवस्था 2025 में 7.4% बढ़ी, कर सुधार और निवेश ने दी मजबूती

सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा, डिजिटल और नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में निवेश ने स्थिर पूंजी निर्माण को बढ़ावा दिया।

By राखी मल्लिक

Jan 10, 2026 17:38 IST

नई दिल्ली : भारत की अर्थव्यवस्था 2025 में दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनी रहने की उम्मीद है। संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड इकोनॉमिक सिचुएशन एंड प्रोस्पेक्ट्स 2026 रिपोर्ट के अनुसार वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। रिपोर्ट जारी होने के बाद भारत के लिए यूएन कंट्री अर्थशास्त्री क्रिस गैरोवे ने कहा कि यह वृद्धि अनुमान हाल की भारत की मजबूत आर्थिक प्रदर्शन के अनुरूप है। उन्होंने बताया कि यह आंकड़ा इस सप्ताह मंत्रालय MoSPI द्वारा जारी 2025-26 वित्तीय वर्ष के अग्रिम अनुमानों से मेल खाता है। यूएन ने यह भी कहा कि आने वाले वर्षों में भारत की वृद्धि दर थोड़ी धीमी हो सकती है और 2026 में 6.6 प्रतिशत तथा 2027 में हल्का बढ़कर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

रिपोर्ट में भारत की मजबूत वृद्धि के तीन मुख्य कारण:

1.निजी खपत की मजबूत वृद्धि

2.पिछले साल निर्यात को बढ़ाने के लिए किए गए अग्रिम प्रयास

3.घरेलू नीतिगत उपाय जैसे कर सुधार और मौद्रिक नीति में रियायत

सरकार द्वारा आधारभूत ढांचा, रक्षा, डिजिटलाइजेशन और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश, जिसने अर्थव्यवस्था में स्थिर पूंजी निर्माण को बढ़ावा दिया। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार क्रिस गैरोवे ने कहा कि ये आंकड़े मजबूत निजी खपत और पिछले साल किए गए निर्यात अग्रिम प्रयासों पर आधारित हैं। रिपोर्ट में भारत में कर सुधार और मौद्रिक नीति में रियायत को लगातार मजबूत वृद्धि का एक कारण बताया गया है। इसके अलावा सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा, डिजिटल और नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में निवेश ने स्थिर पूंजी निर्माण को बढ़ावा दिया।

आगामी वर्ष की अपेक्षाएं : 2026 में वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान, मजबूत घरेलू खपत और सार्वजनिक निवेश साथ ही कम ब्याज दरें आर्थिक गतिविधियों को सहारा देंगी। अमेरिकी आयात शुल्क कुछ उत्पादों पर असर डाल सकते हैं, लेकिन मुख्य निर्यात खंड प्रभावित नहीं होंगे। दूसरे बाजारों से मजबूत मांग से इसका आंशिक असर कम होगा।

जोखिम और चुनौतियां : व्यापार नीति में अस्थिरता एक निकटवर्ती जोखिम बनी हुई है। वैश्विक व्यापार में बदलाव, लगातार कीमतों में दबाव और जलवायु संबंधी संकट के बीच अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए वैश्विक समन्वय और सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता होगी। राजनीतिक तनाव बढ़ने, नीतियों का अधिक देश-केंद्रित होना और बहुपक्षीय समाधानों की गति धीमी होने के कारण चुनौतियां और बढ़ गई है।

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