कोलकाताः पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनावी माहौल के बीच अब कानूनी और सामाजिक चिंताएं भी तेज हो गई हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस प्रक्रिया पर गंभीर आशंका जताते हुए कहा है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके अन्य अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं।
कोलकाता में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भूषण ने कहा, “मताधिकार केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव है। यदि इसे छीन लिया जाता है, तो इससे अन्य अधिकारों के कमजोर होने या खत्म होने का रास्ता खुल सकता है।”
“आज वोटर लिस्ट, कल पहचान पर सवाल”
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए कहा कि SIR के तहत लाखों लोगों के नाम हटाना केवल चुनाव तक सीमित नहीं रह सकता। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में आधार जैसे पहचान पत्रों की वैधता पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं।
यादव ने कहा, “आज नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, कल इन्हीं लोगों के अन्य दस्तावेजों पर सवाल उठ सकते हैं। यह एक व्यापक प्रक्रिया की शुरुआत हो सकती है।”
91 लाख नाम हटने का दावा, आंकड़ों पर सवाल
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, SIR प्रक्रिया के बाद पश्चिम बंगाल में करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। यह कुल मतदाताओं का लगभग 11.85 प्रतिशत हिस्सा बताया जा रहा है। हालांकि, अंतिम मतदाता सूची अभी जारी नहीं हुई है।
यादव ने इन आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जहां अन्य राज्यों में ड्राफ्ट से फाइनल सूची तक मतदाताओं की संख्या बढ़ी है, वहीं पश्चिम बंगाल में गिरावट “असामान्य” है। उन्होंने इसे संभावित गड़बड़ी का संकेत बताया।
“नागरिकता की प्रकृति बदलने का खतरा”
अर्थशास्त्री परकाला प्रभाकर ने इस पूरे घटनाक्रम को लंबे समय के नजरिए से देखते हुए कहा कि इसका असर केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने आशंका जताई कि देश दो वर्गों में बंट सकता है-एक, जिनके पास मतदान का अधिकार है और दूसरे, जो इससे वंचित हैं।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अहम
इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जल्द ही सुनवाई होने वाली है, जिसे इस विवाद का अहम मोड़ माना जा रहा है। याचिकाओं में SIR प्रक्रिया को चुनौती दी गई है।
भूषण ने इसे “व्यापक अधिकार हनन की दिशा में एक कदम” बताते हुए कहा कि यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिक और राज्य के रिश्ते को बदलने की कोशिश हो सकती है। चुनाव से ठीक पहले उठे ये सवाल पश्चिम बंगाल की राजनीति को और संवेदनशील बना रहे हैं, जहां अब बहस सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की भी होती नजर आ रही है।