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स्वास्थ्य विभाग का खुलासा: गुणवत्ता परीक्षण में फेल हुए 45 दवाओं के बैच, 5 प्रमुख कंपनियां भी शामिल

'पश्चिम बंगाल फार्मास्युटिकल्स' का रिंगर्स लैक्टेट सलाइन असुरक्षित पाया गया। विभाग ने इन दवाओं का उपयोग तुरंत रोकने और बाजार से स्टॉक वापस लेने का निर्देश दिया है, ताकि मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

By लखन भारती

Jan 21, 2026 15:40 IST

कोलकाताः बंगाल स्वास्थ्य विभाग ने हाल ही में राज्य में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है, जिसने चिकित्सा जगत और आम जनता के बीच चिंता बढ़ा दी है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी की गई ताजा सूची के अनुसार, विभिन्न कंपनियों द्वारा निर्मित दवाओं के 45 विशिष्ट बैच गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतर पाए हैं। इस सूची में राज्य की पांच प्रमुख फार्मास्युटिकल कंपनियों के नाम भी शामिल हैं, जो इस पूरे मामले को और अधिक गंभीर बनाता है।

इस सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम 'पश्चिम बंगाल फार्मास्युटिकल्स' का है, जिसके 'रिंगर्स लैक्टेट सलाइन' के एक विशेष बैच (03बी3911) को गुवाहाटी की एक लैब ने परीक्षण के बाद असुरक्षित घोषित किया है।

गौरतलब है कि पिछले साल भी इसी कंपनी के सलाइन को लेकर काफी विवाद हुआ था, जिसके बाद सरकार ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस बार भी दिसंबर में लिए गए नमूनों की जांच के बाद विभाग ने इसे फिर से विफल पाया हैराज्य की अन्य कंपनियों में हावड़ा की 'लाइफ फार्मास्युटिकल्स' का क्रोमोस्टेट इंजेक्शन, जगाछा स्थित 'डायमंड ड्रग्स' का एल्युमीनियम हाइड्रोक्साइड जेल, कोलकाता की 'सनी इंडस्ट्रीज' का पोटेशियम क्लोराइड और 'कैपलेट इंडिया' का ओआरएस (ओआरएस) घोल भी मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहा। इन दवाओं के नमूनों की जांच कोलकाता की विभिन्न प्रयोगशालाओं में की गई थी।

स्वास्थ्य विभाग ने केवल बंगाल ही नहीं, बल्कि गुजरात, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड की कंपनियों द्वारा निर्मित एंटीबायोटिक्स और कफ सीरप जैसे कई उत्पादों के विशिष्ट बैचों को भी इस सूची में शामिल किया है।

विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि इन चिन्हित बैचों की दवाओं का उपयोग तुरंत बंद कर दिया जाए। साथ ही, संबंधित कंपनियों और वितरकों को आदेश दिया गया है कि वे बाजार में मौजूद इन दवाओं के स्टाक को अविलंब वापस लें (रिकॉल करें)। सरकार के इस कड़े रुख का उद्देश्य मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और दवाओं के निर्माण में बरती जा रही लापरवाही पर लगाम लगाना है।

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