पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की सुनवाई के लिए गिनकर मात्र 18 दिन ही बचे हुए हैं। महज इतने दिनों में ही लॉजिकल इनकंसिस्टेंसी वाली सूची में शामिल 94 लाख 49 हजार मतदाताओं को उनके दस्तावेजों के सत्यापन के लिए सुनवाई के लिए बुलाना होगा। हर दिन औसतन 5 लाख 25 हजार मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाना पड़ेगा।
उसमें भी एक संभावना यह रह जा रही है कि अगर कोई मतदाता पहली सुनवाई में आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाता है तो उसे दोबारा बुलाना होगा। यानी सुनवाई के लिए बुलाए जाने वाले मतदाताओं की संख्या में वृद्धि! इस बीच एक नयी समस्या...
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आदेश दिया है कि लॉजिकल गड़बड़ियों वाले मतदाताओं की पूरी सूची जारी करनी होगी और अगले 10 दिनों में इन मतदाताओं को नोटिस भेजना पड़ेगा। चुनाव आयोग के वेबसाइट के साथ ग्राम पंचायत ऑफिस, ब्लॉक ऑफिस और वार्ड ऑफिस में भी यह सूची रखनी होगी।
हर ब्लॉक ऑफिस में इसके लिए एक अलग काउंटर खोलना होगा और इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अधिकतम दो सप्ताह का समय...! ऐसी स्थिति में अब चुनाव आयोग के अधिकारियों को संदेह है कि सुनवाई की प्रक्रिया क्या निर्धारित समय के अंदर पूरी हो भी पाएगी?
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सिर्फ लॉजिकल गड़बड़ियों वाली सूची ही जारी करने का आदेश नहीं दिया है बल्कि माध्यमिक के एडमिट कार्ड को भी आयु प्रमाणपत्र के तौर पर स्वीकार करने का आदेश दिया है। राज्य चुनाव आयोग के अधिकारियों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार अब तक करीब 35 लाख सुनवाई हो चुकी है जिसमें से कम से कम 15 प्रतिशत में एडमिट कार्ड को दस्तावेज के तौर पर मान्यता दी गयी थी लेकिन उसके बाद ही चुनाव आयोग का नया आदेश आया जिसमें इसकी मान्यता को रद्द कर दिया गया।
अब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के फिर से चुनाव आयोग मतदाताओं के एडमिट कार्ड को स्वीकार करने के लिए नए इंतजाम करेगा। चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि इसमें भी कुछ वक्त लग सकता है। इसके साथ ही चुनाव आयोग के अधिकारी एक और संदेह व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि सुनवाई सेंटर्स पर पहले से ही अफरा-तफरी का माहौल है। ऐसे में राजनैतिक पार्टियों के बूथ लेवल एजेंट (BLA-2) को प्रवेश करने की अनुमति मिलने के बाद यह अफरा-तफरी और बढ़ सकती है। आयोग की चिंता है कि इन सभी समस्याओं को निपटा कर क्या 14 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची जारी की जा सकेगी?
राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) मनोज अग्रवाल सोमवार को दिल्ली में चुनाव आयोग के ऑफिस में थे। 'लॉजिकल गड़बड़ियों' पर आयोग के साथ उनकी लंबी बैठक भी हुई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर भी चर्चाएं हुई। सूत्रों का दावा है कि गड़बड़ियों वाली सूची में 30-35 लाख मतदाताओं के नाम में 2002 की सूची वाले नाम या सरनेम में स्पेलिंग की गलती या नाम में मिडिल नेम का जुड़ना या कटना जैसी दिक्कतें हैं।
सुनवाई का समय बचाने के लिए CEO ने इन मामलों को BLO-ERO-AERO के जरिए निपटाने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि तब भी करीब 59 लाख लोगों की सुनवाई होनी है। आयोग के कई अधिकारियों का मानना है कि इतने बड़ी संख्या में मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच के के लिए समय-सीमा बढ़ाना जरूरी है।