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तीन महीने बाद आंगनवाड़ी में बच्चे, क्या खत्म हुआ जातिभेद?

ओडिशा में आंगनवाड़ी में दलित रसोइया के हाथ का खाना खाने लौटे बच्चे।

By सौमी दत्त, Posted by: प्रियंका कानू

Feb 17, 2026 12:55 IST

भुवनेश्वर: तीन महीने बाद फिर बच्चों की हंसी-खुशी से भर उठा आंगनवाड़ी केंद्र। दलित युवती को केंद्र में हेल्पर तथा रसोइया के रूप में नियुक्त किए जाने के बाद से उच्च जाति के जिन ग्रामीणों ने अपने बच्चों को भेजना बंद कर दिया था, वही अभिभावक सोमवार को बच्चों को लेकर पहुंचे ओडिशा के केंद्रापाड़ा जिले के नुआगांव स्थित आंगनवाड़ी केंद्र में। वहां दलित युवती शर्मिष्ठा सेठी के हाथ का बना खाना बच्चों ने चाव से खाया। इतना ही नहीं, गांव की नवमाताएं भी आंगनवाड़ी केंद्र आकर अपना निर्धारित राशन लेकर गईं। सोमवार का यह दृश्य देखकर संतुष्ट शर्मिष्ठा ने कहा, "मैं चाहती हूं कि इसी तरह जात-पात का भेद मिट जाए। भेदभाव फिर कभी गांव में सिर न उठा सके।"

3 से 6 वर्ष के बच्चों को प्री-स्कूल शिक्षा, पौष्टिक भोजन और घर के लिए राशन वितरण के उद्देश्य से गांव-गांव में सरकारी आंगनवाड़ी केंद्र बनाए गए हैं। गर्भवती और नवमाताओं को भी इन केंद्रों से पौष्टिक राशन दिया जाता है। केंद्रापाड़ा के इस केंद्र में भी यही काम होता था। पिछले नवंबर में दलित युवती शर्मिष्ठा को आंगनवाड़ी में रसोइया-हेल्पर के रूप में नियुक्त किया गया। इसके बाद विवाद शुरू हुआ। उच्च जाति के ग्रामीणों ने कहा कि वे अपने बच्चों को दलित युवती के हाथ का बना खाना नहीं खिलाएंगे और उसके हाथ से राशन भी स्वीकार नहीं करेंगे। 20 नवंबर से केंद्र लगभग खाली पड़ा था। कर्मचारी आते थे लेकिन बच्चे और महिलाएं नहीं आती थीं।

स्थिति को देखते हुए सरकार ने जातिवाद विरोधी जागरूकता अभियान शुरू किया। कई बैठकों का आयोजन कर ग्रामीणों को समझाया गया। शनिवार को भी जिला प्रशासन की ओर से ऐसी ही एक बैठक हुई थी। इसके बाद रविवार को केंद्रापाड़ा के सांसद बैजयंत जय पांडा स्थानीय भाजपा नेताओं और ग्रामीणों के साथ उस आंगनवाड़ी केंद्र पहुंचे। वहां सभी के साथ जमीन पर बैठकर शर्मिष्ठा के हाथ का बना भोजन खाया और उनके साथ सेल्फी भी ली। जय ने उसकी तस्वीर साझा भी की। इसके बाद सोमवार को देखा गया कि केंद्र में पंजीकृत 20 बच्चों में से 15 बच्चे आए, पांच बीमारी के कारण नहीं आ सके। अभिभावकों ने घर के लिए सरकारी राशन लेना भी स्वीकार किया।

21 वर्षीय शर्मिष्ठा ने कहा, "पहले बच्चों को रागी से बने लड्डू दिए, फिर चावल और दालमा परोसा। उन्हें खुशी से खाते देख मेरा मन भर आया। केंद्र में फिर से रौनक लौट आई है।" केंद्रापाड़ा बाल विकास परियोजना की अधिकारी दीपाली मिश्रा ने कहा कि यह बदलाव समाज को सकारात्मक संदेश देगा। दलित परिवार की बेटी शर्मिष्ठा अपने समुदाय की पहली स्नातक हैं। गांव से आंगनवाड़ी की इस नौकरी के लिए आवेदन करने वाली वह अकेली थीं। इस पद के लिए उनकी योग्यता आवश्यकता से अधिक है, फिर भी उन्हें कोई अफसोस नहीं। पांच हजार रुपये मासिक वेतन उनके परिवार के लिए बड़ी मदद है। वह दूरस्थ डिप्लोमा भी कर रही हैं और भविष्य में शिक्षिका बनने का सपना देखती हैं।

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